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| 04.06.2008 |
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होली का रंग
राकेश खण्डेलवाल |
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लजाती ओढ़ कर चूनर सुनहरी, खेत में बाली
डिठौना बन गई सरसों, बहारों की जवानी का बिरज ने टेसुओं का है नया पीताम्बर ओढ़ा कथानक लिख रही जमुना उमंगों की कहानी का हरे नीले गुलाबी रंग, सूखे और हैं गीले चमकते कत्थई भी बैंगनी भी और हैं पीले अधर के रंग, आँखों के, कपोलों पर खिंचे जो भी बुलावा दे रहे हैं आज सुधि को भूल कर जी ले चुहल अँगड़ाईयाँ लेती सजी है आज आँगन में शहद में डूब कर मलयज थिरकती झूम कानन में रँगा है रंग होली के भ्रमित सा हो गया मौसम घुली मल्हार सावन की लगा है आज फ़ागुन में |
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