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ISSN 2292-9754

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02.05.2015


होगी किस घड़ी फिर रुत सुहानी

रश्मियाँ साथ ले जब दिवाकर का रथ चल दिया था इधर मुस्कुराता हुआ
रंग प्राची के चहरे का रक्तिम हुआ उस घड़ी जाने कैसे लजाते हुए
ओस ने रोशनी चूम कर छेड़ दी एक अंगडाई लेती हुई कुछ धुनें
मंदिरों में हुई आरती में घुले कंठ के बोल फिर गुनगुनाते हुए
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हो अधीरा आस उत्सुक दृष्टि से पथ जोहती हैं
औ' प्रतीक्षा की घड़ी इक ढल गई लगता अयन में

कोर पर आ होंठ के अँगड़ाईयाँ लेती कहानी
मुस्कुराहट की गली में खिलखिलाती रात रानी
और ठोड़ी से उचक कर पूछता तिल बात नथ से
ओढ़ कर सिन्दूर होगी किस घड़ी फिर रुत सुहानी

तब नयन के स्वप्न रँग देते कपोलों को पिघल कर
स्वर्ण अरुणिम आभ वाली बदलियाँ घिरतीं गगन में

भावना की कशमकश से जूझता मन बावरा सा
चित्र उजले पॄष्ठ पर सहसा उभरता साँवरा सा
झनझनाती हैं हवा की पैंजनी अंगनाईयों में
कोई परिचय एक पल में पास आता बाँकुरा सा

उड़ परीवाली कथाओं का कोई अध्याय अन्तिम
आ अचानक रंग अनगिनती भरे जाता सपन में

दृष्टि जाकर के परे सीमाओं के रह रह अटकती
टिक नहीं पाती किसी भी बिन्दु पर फिर फिर भटकती
गंध बिखराती प्रतीक्षा की अगरबत्ती हज़ारों
गुनगुनी परछाइयों की ढेर सी कलियाँ चटखतीं

आस के उमड़े हुए बादल बरसते हैं निरन्तर
और बोते हैं नई आकाक्षा पथ के विजन में


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