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05.03.2012
 
गीत बनने से पहले बिखरते गये
राकेश खण्डेलवाल


आपका ये तकाजा लिखूँ गीत मैं
छंद बनने से पहले बिखरते गये

अक्षरों के लगा पंख उड़ न सके
भाव बैठे थे अनुभूति की शाख पर
मन की खिड़की पे लटकी हुईं चिलमनें
देख पाये न बाहर तनिक झाँक कर
ज्यों गिरा नैन बिन, नैन वाणी बिना
भाव शब्दों बिना, शब्द भावों कटे
एक जुट हो कभी वाक्य बन न सके
शब्द सारे रहे हैं गुटों में बँटे

और अभिव्यक्तियों के निमिष, आँख की
कोर पर आये, आकर पिघलते रहे

 शब्द को चूमने को हुई आतुरा
लेखनी पृष्ठ के पंथ पर है खड़ी
भावनाओं की परवाज को बाँध कर
झनझनाती है बिखराव की हथकड़ी
जो अलंकार हैं उनको आवारगी
ले गई साथ अपने कहीं दूर ही
उठ न पाई है बिस्तर से उपमा कोई
सो आलस से थक कर हुई चूर थी

दंश तीखे दिये जा रही व्याकरण
जोकि सीधे हृदय में उतरते गये

फिर ये सोचा लिखूँ, नाव, नदिया कमल
फूल जूही के साया अमलतास का
रंग सिन्दूर का, स्वर्ण प्राची के पल
और सम्बन्ध आशा से विश्वास का
गागरी भर तॄषा, आंजुरि तॄप्ति को
प्रीतमय दॄष्टि की अनवरत साधना
डूब ॠतुगंध में मुस्कुराती हु
गुनगुनाती हुई एक शुभकामना

पर कलम की गली पूर्ण निर्जन रही
रेत के बस बगूले उमड़ते रहे

लिख न पाया तो सोचा कि गाऊँ मैं, मन
की अंधेरी गुफ़ाओं की आवाज़ को
सरगमों के रुदन को जो पीता रहा
साँस की पीर के एक उस साज को
अनकही रह गई अधखुले होंठ पर
थरथराती हुई एक सौगन्ध को
प्राण ने चेतना से कभी था किया
एक अव्यक्त अभिप्राय अनुबन्ध को

 थाम पाये न झंकार की बाँह स्वर
तार की अलगनी पर फ़िसलते रहे

साँकलों में घिरी याद की कोठरी
कोई चाबी नहीं खोल ताले सके
घुट अंधेरे में बैठी हैं अंगनाईयाँ
ताक पर सारे जाकत उजाले टँगे
नीम की छाँह दीवार ने छीन ली
सावनों के अधर उग रही प्यास है
जिसकी सोचा कि थामूँ तनिक उँगलियाँ
राह भटका हुआ वो भी मधुमास है

पूजते हम रहे पंचमी को मदन
और आशाओं के पात झरते रहे

टूटने लग गई साँस की लय-गति
ताल धड़कन की बेताल होने लगी
दायरे में घिरीं भावना से परे
अर्थ अनुभूतियाँ आज खोने लगीं
स्वर विमुख हो गया, शब्द आया नहीं
और विद्रोह भाषा किये जा रही
राग छूटे, न गंधें हवा में उड़ीं
स्पर्श में कोई पांखुर नहीं आ रही

हम समर्पित किये जा रहे अब कलम
शब्द जिससे निगाहें बदलते रहे

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