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| 12.09.2007 |
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एक वह प्रस्तावना हो राकेश खण्डेलवाल |
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मीत तुम मेरे सपन के इन्द्रधनुषी इक कथानक
के लिये जो पूर्णिमा ने है लिखी, प्रस्तावना हो जानता हूँ जो दिवस के संग शुरू होगी कहानी पाटलों पर जो लिखेगी, रश्मि बूँदों की जुबानी पंछियों के कंठ के स्वर का उमड़ता शोर लेकर गंध में भर कर सुनायेगी महकती रात रानी और हर अध्याय में जो छाप अपनी छोड़ देगी तुम उसी के केन्द्रबिन्दु की सँवरती कामना हो फूल के द्वारे मधुप ने आ जिसे है गुनगुनाया धार की अँगड़ाइयों ने साज पर तट के बजाया ज्योति पृष्ठों पर लिखा है जल जिसे नित वर्त्तिका ने नॄत्य करते पाँव को जो घुंघरुओं ने है सुनाया वह विलक्षण राग जो संगीत बनता है अलौकिक तुम उसी इक राग की पलती निरंतर साधना हो आहुति के मंत्र में जो घुल रही है होम करते जो जगी अभिषेक करने, सप्तनद का नीर भरते मधुमिलन की यामिनी में स्वप्न की कलियाँ खिला कर जो निखरती है दुल्हन के ध्यान में बनते सँवरते शब्द की असमर्थता जिसको प्रकाशित कर न पाई मीत तुम अव्यक्त वह पलती हृदय की भावना हो |
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