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| 03.16.2009 |
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एक दिवस वह डरा डरा सा राकेश खण्डेलवाल |
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एक दिवस जब तुम मुझसे थे अनजाने ही दूर हो गये वह इक दिवस आज भी मेरी आँखों में है भरा भरा सा वह इक दिवस ज़िन्दगी की पुस्तक का पन्ना फटा हुआ सा जोड़ गुणा के समीकरण में से केवल वह घटा हुआ सा रंग बिरंगे कनकौओं की आसमान में लगी भीड़ से एक वही है पड़ा धरा पर बिना डोर के कटा हुआ सा वह दिन देखा रथ पर चढ़ कर जाती थी अरण्य वैदेही और दग्ध मन लिये विजेता लंका का था डरा डरा सा वह दिन जब कुन्ती ने अपना लाड़ बहाया था पानी में वह दिन हुए अजनबी पासे, जब इक चौसर पहचानी में वह दिन पाँव बढ़े थे आगे, जब खींची सीमा रेखा से वह दिन बिके भाव जब मन के और बिके केवल हानी में वह दिन अटका हुआ याद के दरवाजे को पकड़े ऐसे जैसे एक नीर का कण हो पत्ते पर, पर झरा झरा सा वह दिन अगर इबारत होता लिखी, सुनिश्चित उसे मिटाता वह दिन भाव मात्र यदि होता, तो मैं उसे शब्द कर जाता वह दिन लेकिन एक फूल के साथ रहे कांटे के जैसा जितना चाहूँ उसे भुलाना उतना सीने में गहराता वह दिन, एक अकेला पत्ता ज्यों पतझर की अँगनाई में अटका हुआ शाख पर सबसे विलग हुआ पर हरा हरा सा |
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