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05.03.2012
 
दॄष्टि के चुम्बन
राकेश खण्डेलवाल

दॄष्टि के चुम्बनों ने छुआ जब मुझे
 खिलखिलाने लगी देह में रागिनी

 सिक्त मधु की फुहारों से होकर नजर
 आई हौले से मेरे नयन द्वार पर
 ओट से चिलमनों की सरकती हुई
 सारी बाधाओं को पंथ की पार कर
 साथ अपने लिये एक मुस्कान की
 जगमगाती हुई दूधिया रोशनी
 दृश्य ले साथ में एक उस चित्र का
 दाँत में जब उलझ रह गई ओढ़नी

 मेरी अनुभूतियों की डगर पर बिछी
 पूर्णिमा की बरसती हुई चाँदनी

 ओस भीगी हुई पांखुरी सा परस
 बिजलियाँ मेरे तन में जगाने लगा
 धमनियों में घुलीं सरगमें सैंकड़ों
 कतरा कतरा लहू गुनगुनाने लगा
 धड़कनों में हजारों दिये जल गये
साँस सारंगियों को बजाने लगी
 बँध गया पूर्ण अस्तित्व इक मंत्र में
 एक सम्मोहिनी मुझपे छाने लगी

 कर वशीभूत मन, वो लहरती रही
 वह नजर एक अद्भुत लिये मोहिनी

 चेतना एक पल में समाहित हुई
 स्वप्न अवचेतनायें सजाने लगीं
 वादियों में भटकती सुरभि पुष्प की
 मानचित्रों को राहें बताने लगीं
 ढाई अक्षर कबीरा के उलझे हुए
 व्याख्यायें स्वयं अपनी करने लगे
 चित्र लिपटे कुहासे में अंगनाई के
 मोरपंखी रंगों से सँवरने लगे

 कल्पना के सुखद एक आभास में
 आज सुधियाँ हुईं मेरी उन्मादिनी


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