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05.03.2012
 
धूप को वह पथ दिखाये
राकेश खण्डेलवाल

चाह तो है शब्द होठों पर स्वयं आ गीत गाये
स्वप्न आँखों में सजे तो हो मुदित वह गुनगुनाये

पॄष्ठ सुधियों के अधूरे, पुस्तकों में सज न पाते
उम्र बीती राग केवल एक, वंशी पर बजाते
हाथ जो ओढ़े हुए थे माँगने की एक मुद्रा
बाँध कर मुट्ठी कहाँ संभव रहा कुछ भी उठाते

कर्ज़ का ले तेल बाती, एक मिट्टी का कटोरा
चाहता है गर्व से वह दीप बन कर जगमगाये

सावनों के बाद कब बहती नदी बरसात वाली
बिन तले की झोलियाँ, रहती रहीं हर बार खाली
मुद्रिकाओं से जुड़े संदेश गुम ही तो हुए हैं
प्रश्न अपने आप से मिलता नहीं होकर सवाली

ओस का कण धूप से मिलता गले तो सोचता है
है नियति उसकी, उमड़ती बन घटा नभ को सजाना

अर्थ तो अनुभूतियों के हैं रहे पल पल बदलते
इसलिये विश्वास अपने, आप को हैं आप छलते
मान्यताओं ने उगाये जिस दिशा में सूर्य अपने
हैं नहीं स्वीकारतीं उनमें दिवस के पत्र झरते

रात के फँदे पिरोता, शाल तम का बुन रहा जो
उस प्रहर की कामना है धूप को वह पथ दिखाये

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