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| 06.12.2007 |
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धूप राकेश खण्डेलवाल |
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बैठी है कबसे आँगन में अलस घुली उजियारी धूप रह रह मुझसे बतियाती है तन्हाई की मारी धूप वैसे तो आने वाला इस ओर नहीं है कोई भी फिर भी कागा बन मुँडेर पर आकर मुझे पुकारी धूप कंगूरों पर चढ़ कर बैठी, दालानों से दूर रही बंगलों में रहती है, शायद हो बैठी सरकारी धूप दुल्हन की आँखों का काजल यूँ तो अक्सर रात बनी अब श्रन्गार नया करती है साँझ ढले कजरारी धूप सोचा था मैने बातों में हँस कर समय गुजर लेगा लेकिन फिर ले आई यादें प्रियतम की बजमारी धूप इसमें इसका दोष नहीं है, मुझे गीतिका लिखनी थी शब्द कोई चुनना था, मैने चुन ली यही बिचारी धूप |
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