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| 06.12.2007 |
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देख लिया राकेश खण्डेलवाल |
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मन्दिर में मस्जिद में जाकर देख लिया गुरुद्वारे में शीश झुका कर देख लिया समझ न पाये कैसा गोरखधंधा है हर द्वारे पे अलख जगा कर देख लिया किसने किसको ठगा व्यर्थ की बाते हैं चौराहों पर प्रश्न उठाकर देख लिया किस्से और कहानी सारे झूठे हैं हमने पास तुम्हारे आकर देख लिया दहलीजों के पत्थर पर कब दूब उगी हमने अपना हाल सुना कर देख लिया |
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