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| 06.11.2007 |
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चाँदनी मुस्कुराते हुए चुप रही राकेश खण्डेलवाल |
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किसकी
अँगड़ाई से है उगी भोर ये,
ढल
गई रात,
जब
सब लगे पूछने
पाँव का नख,
जहाँ था कुरेदे जमीं देखिये अब वहाँ झील इक बन गई
धूप
मुस्कान की छू गई
तो कली,
अपने यौवन की देहरी पे चढ़ने लगी
आपके इंगितों से बँधा है हुआ,
सबसे आकर कहा सावनी मेह ने
आपके कंगनो की खनक से जुड़ी तो हवा गीत गाने लगी प्यार के
चूम
कर हाथ की मेंहदी को गगन साँझ सिन्दूर के रंग रँगने लगा
आप
जब रुक गये,
काल
रथ थम गया किस तरफ़ जाये सबसे लगा बूझने |
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