अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.08.2014


भाग्य रेख में कुछ संशोधन

ओ अनामिके जब से तेरा नाम जुड़ा मेरे अधरों से
उस पल से मन के सब गहरे भावों का हो गया विमोचन

लगीं गूँजने सुधि के आँगन, लैला शीरीं हीर कथायें
गुलमोहर के साथ दुपहरी निशिगंधा को ला महकायें
बरखा की बून्दों से मिलकर गूँज उठे सरगम के सब स्वर
और सितारों की छाया में गीत सुनाने लगीं विभायें

ओ संकल्पित! जब से तेरा नाम जुड़ा है संकल्पों से
उस पल से लगता जीवन को मिला और कुछ नया प्रयोजन

हुई पुन: जीवन्त लवंगी के सँग कथामयी मस्तानी
संयोगिता, सुभद्रा, रुक्मिणी और सती की प्रेम: कहानी
देवलोक का त्याग उर्वशी करती डूब भावना जिसमें
वैसी ही भावना अचानक लगी मुझे जानी पहचानी

ओ समर्पिते! जब से तेरा मूक समर्पण महसूसा है
तब से स्वर्णिम आभाओं से दीप्त हुए हैं मेरे लोचन

लिखे गये अध्याय स्वत: कुछ नये ज़िन्दगी की पुस्तक में
बहती हुई हवाओं ने लीं पीपल की छाया में कसमें
जुड़े करों में झरे गगन से अभिलाषा के सुमन अनगिनत
फिर से गहरी हुईं देवयानी ने जो जोड़ी थीं रस्में

सजलतूलिके! छू ली तूने जबसे मेरी खुली हथेली
तब से मेरी भाग्य रेख में हुए अनूठे कुछ संशोधन


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें