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| 01.09.2008 |
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बस पंथ थम गया राकेश खण्डेलवाल |
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पाँव हमारे ही अक्षम थे
उठे न पथ में एक कदम भी और लगाते दोष रहे यह मंज़िल का पथ स्वयं थम गया किरण ज्योति की बो न सके हम सूनी रही हृदय की क्यारी यही एक कारण, आँगन में सिर्फ़ बिखरता हुआ तम गया असमंजस के श्यामपट्ट पर बने न निर्णय के श्वेताक्षर शंकायें जो कल घिर आईं आईं फिर से आज उमड़ कर जुड़ीं अनिश्चय के चौराहे पर न कभी निश्चय की गलियाँ ऊहापोहों के गमले में उगी न संकल्पों की कलियाँ और सँजोई पूँजी में से एक दिवस हो और कम गया खड़े रहे हम ही राहों में कहते हैं, बस पंथ थम गया रहे बिखेरे अँगनाई में संशय के बदरंग कुहासे खड़े रहे देहरी को थामे किसी प्रतीक्षा को दुलराते इन्द्रधनुष चाहत के हमने प्रश्न चिन्ह से रखे टाँग कर रहे ढूँढ़ते रेखाओं को आईने से साफ़ हाथ पर और संजोते रहे पोटली में जो बिखरा हुआ भ्रम गया पाँव हमारे उठे नहीं, हम कहते हैं बस पंथ थम गया फूलों की हर गंध, नाम के बिना द्वार से लौटा दी है द्वार चाँदनी आई तो बस यही शिकायत की आधी है बिकीं रश्मि जब बाज़ारों में हम तटस्थ ही खड़े रह गये मधुमासों को नीरस कहते अपनी ज़िद पर अड़े रह गये अस्त-व्यस्त यूँ हुई ज़िन्दगी टूट बिखर कर सभी क्रम गया पाँव हमारे उठे नहीं, हम कहते हैं बस पंथ थम गया |
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