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| 06.12.2007 |
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आप राकेश खण्डेलवाल |
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एक अनुभूति है जिसको चीन्हा नहीं
पर लगा हूँ उसे बाँह में भींचने मेरे अहसास के दायरे में कहीं हैं छुपे आप आते नहीं सामने ढूँढते ढूँढते हैं निगाहें थकीं पर बताया नहीं कुछ पता गाँव ने एक आभास जैसे चली हो हवा एक खुशबू कि जिसने मुझे है छुआ एक सपना खड़ा नींद की कोर पर एक मुट्ठी भरी धूप लाई उषा रंग पानी से लेकर क्षितिज पर कहीं रूप के चित्र फिर से लगा खींचने कल्पना की सुराही से छलकी हुई पी रहा हूँ मधुर ज्योत्सना की सुधा चेतना का मेरी हर निमिष, आपके ध्यान के सिन्धु में प्राण डूबा हुआ फूल की पाँखुरी में रही खोजती चित्र बस आपके चाँदनी की किरन हर दिशा को रही खटखटा कामना आरजुओं की कर प्रज्वलित इक अगन फिर मिलन की उगें कुछ द्वार पर दे के सौगन्ध उनको लगा सींचने भोर की वीथियों में उगे ओस कण आपके पाँव की हैं महावर बने मोतियों सी सुघर एक पदचाप से छन्द नूतन कई सरगमों के बने आपके कुन्तलों से उठी इक घटा नभ में बरखा के छींटे उड़ाने लगी ओढ़नी के किनारे से पुरबा चली वादियों में ग़ज़ल गुनगुनाने लगी आपका रूप आँखों से हो न विलग दोपहर से लगा हूँ पलक मींचने |
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