राकेश खण्डेलवाल

कविताएँ
अंतिम गीत लिखे जाता हूँ
अनुत्तरित प्र्न
अपने सिरहाने के पत्तों ...
अपाहिज व्यथा
असलियत बस अँगूठा ...
अस्मिता खो गई
आँसू पी लिए
आज अनुभूतियाँ शब्द...
आज उन्हीं शब्दों को मेरी
आज फिर महका किसी ...
आप
आप - अंतराल के बाद
आप उपवन में आए
आप चाँदनी
आप जिसकी अनुमति दें
आप-फिर एक बार
आपकी याद
आस्था घुल रही आज ..
इबारत
इसीलिये मैं मौन रह गया
उत्तर गुमनाम रहे
उत्तर सारे मौन रह गये
उम्र की शाख से पत्र झरते रहे
उस पल यादों के पाखी
एक कंदील की हो गई रहजनी
एक दिवस वह डरा डरा सा
एक वह प्रस्तावना हो
ओ अपरिचित ! आओ हम तुम
ओ मेरे प्राणेश-नहीं है कुछ भी
ओ पिया ओ पिया
कभी कभी यह मन यूँ चाहे
कर्ज़ का तक़ाज़ा
कल्पना के चित्र मेरे
कविता पुरानी
कहो पढ़ा क्या प्रियतम तुमने
कविता जम गई है-सर्दी का..
क्या, कहाँ, कब, कौन
क्यों न कहो मैं गीत सुनाऊँ
कितने गीत और लिखने हैं
किसलिये मैं गीत गाऊँ
क्या करूँगा
क्या तुम ही हो
क्या संभव इस बार
गीत की चाहत
गीत गाऊँ आज बोलो
गीत गाता जा रहा हूँ
गीत बनने से पहले बिखरते गये
गुनगुनाया हमें
गुलमोहर
गोकुल आवाज़ें देता है
चन्दन लेप लगाया किसने
चाँदनी चेहरा छुपाने लगी
चाँदनी मुस्कुराते हुए चुप रही
चाँदनी रात के

चित्र मावस का
छलके शब्दों की गागरिया
जाने क्यों लगता है
जितने मिले धूप के टुकड़े
ज़िन्दगी मोम बन कर ...
ज़िन्दगी प्रश्न करती रही
ज़िन्दगी बस बिलम्बित...
जीवन के इस संधि पत्र पर
झंकार
तीन मुक्तक
तुम
तुम न आये
तुमने मुझसे कहा, लिखूँ मैं..
तुम्हें गीत बन जाना होगा
तेरे नाम लिखूँ
थरथराती हुई उँगलियों से
दीपावली 2004
देख लिया
दॄष्टि के चुम्बन
धूप
धूप को वह पथ दिखाये
नव वर्ष
नहीं संभव रहा
नाम तुम्हारा आ जाता है
नाम मैंने लिखा प्रीत का
निगाहों के प्रश्न
निद्रा आ उन्हें फिर भेड़ती है
नींद के साथ शतरंज
नू
पतझड़ का अध्याय खुला
पूजा की थाली
प्रश्न करने लग गई निशिगन्ध
प्राची और प्रतीची
फागुन
बस इतना तुम याद न आओ
बस तुम्हारा नाम गाते
बस पंथ थम गया
भाग्य रेख में कुछ संशोधन
भाव की चंचल हवायें
मन्दिरों में घंटियाँ
मन व्यथित मेरे प्रवासी
मान्यता आस्था
मिली ही नहीं व्याकरण की गली
मेंहदी
मेरे भेजे हुए संदेसे
मैं इक गीत लिखूँ
मैं गाता ही रह गया
मैंने लिखा नाम बस वह ही
मौसम
यादों का मौसम
राह बस घूमती रह गई
लड़खड़ाने लगी बाग में हवा
लिख पाया नहीं गीत
लिखता हूँ अध्याय चाह के
लेखनी अब हो गई स्थिर
वन्दन
वक्त की हवायें
वाणी ने कर दिया समर्पण
वीरानी
व्यूह ख़ामोशियों के
शब्द छिन गये
शब्द से दूरी
शून्य से जोड़ बाकी गुणा भाग में
सम्बोधन पर आकर अटकी
सहमे झरने खड़े
साँझ दुश्मन है
साँस के तकाज़े
सावन
हम गीतों के गलियारे में
होगी किस घड़ी फिर रुत सुहानी
होली का रंग
दीवान
खो गए चाँदनी रात में