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| 06.12.2007 |
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भाव की चंचल हवायें राकेश खण्डेलवाल |
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भाव की चंचल हवायें
कल्पना की क्यारियों में छन्द का सौरभ जगा कर गीत की कलियाँ खिलायें बाँसुरी को साँस देकर राग के नूपुर बजाती ओढ़नी को अलंकृत कर वादियों में खिलखिलाती आस के झूले बढ़ातीं पेंग देकर, नील नभ तक और हथेली की हिना को रंग देकर मुस्कुरातीं मलयजी झोंके सजायें भर बदन को सिहरनों के ओस भीगे चुम्बनों से प्यार के स्वर गुनगुनायें चौक में बूटे बना कर अल्पना के रंग भरतीं नयन की अमराइयों में स्वप्न बन बन कर विचरतीं थाम कर काली घटा की उँगलियाँ आषाढ़ के दिन तृषित मन की वीथियों में मधु कलश भर भर बरसतीं एक पल को गुदगुदाकर एतिहासिक क्षण हृदय के कुछ, पुन: जीवन्त करके होंठ पर स्मित जगायें धूप बासन्ती बिखेरें, शिशिर मन के बन्द पाट पर अंक में अपने समेटे चिन्ह पग के सिन्धु तट पर कोयलों के स्वर पपीहे की पुकारों में पिरोकर कुछ नये अध्याय लिख दें कुन्तलों की एक लट पर लाज मादक क्षणों की एक मंजूषा बनायें याद की अलमारियों में और पल पल झिलमिलायें भाव की चंचल हवायें |
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