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ISSN 2292-9754

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07.10.2014


पंछियों के उग गए पर आजकल

पंछियों के उग गए पर आजकल
मौत से कोई गया डर आजकल

हर तरफ बदला है मौसम, देख लो
आ गया फिर से है पतझर आजकल

आदमी है बेजुबां और बेख़बर
आदमी की बात मत कर आजकल

जा उसे ढेरों दुआएँ दे के आ
लौटकर आया है वो घर आजकल

जाल अपना अब तू मत फैला यहाँ
उड़ गए सारे कबूतर आजकल

आ, मेरी लहरों में थोड़ा खेल लें
अब नहीं कहता समुन्दर आजकल


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