अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.13.2014


बंद जबसे कारखाने हो गए

बंद जबसे कारखाने हो गए
भूख के बच्चे सयाने हो गए

प्यार की मुरझा गईं सब पत्तियाँ
याद के चेहरे पुराने हो गए

ख़त में तुमको ही पढ़ा करते थे हम
अब तो उसको भी ज़माने हो गए

ज़िन्दगी को चार दिन की कह गए
पर कठिन दो दिन बिताने हो गए

आग जंगल में लगाई किसलिए
सहमे-सहमे - आशियाने हो गए


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें