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ISSN 2292-9754

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01.31.2018


काशी नागरीप्रचारिणी सभा का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

काशी नगरी अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के साथ ही साथ भारतीय शिक्षा का भी महत्वपूर्ण केन्द्र रही है। संस्कृत भाषा एवं साहित्य के साथ ही हिंदी भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में इसका योगदान निर्णायक रहा है। इसी काशी में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के उत्थानार्थ नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना हुई जिसकी बहुमुखी साधन न केवल नागरी प्रचार, शब्दकोशों के निर्माण, हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज, साहित्य एवं इतिहास के पुनरूत्थान वरन् शिक्षा के प्रणयन, प्रचार-प्रसार एवं विस्तार में भी फलीभूत हुई।

नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना 16 जुलाई, 1893ई. को काशी में हुई थी जिसके मूल में नागरी (हिंदी भाषा और नागरी लिपि) का प्रचार प्रमुख था। इसके स्थापनकर्तात्रय पं. रामनारायण मिश्र, बाबू शिवकुमार सिंह और बाबू श्यामसुंदरदास थे।1 स्थापनोपरांत नागरी (हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि) के प्रचार के साथ ही सभा के जो उद्देश्य निर्धारित किये उनमें शिक्षा भी प्रमुख था जैसा कि सभा के वार्षिक विवरण से स्पष्ट होता है कि "शिक्षा के प्रसार को बढ़ावा देना और शिक्षित भारतीयों की उन्नति का प्रयास करना।"

‘........... इस तरह के अन्य साधनों का प्रयोग करना, जो लाभदायक एवं आवश्यक हो, जिनसे सभा के लक्ष्य की प्राप्ति हो सके, सभा की बैठकों में समय-समय पर सुझाये जायेंगे।"2

नागरीप्रचारिणी सभा के उद्देश्य ‘नागरी मेमोरियल सब-कमेंटी’ के सेक्रेटरी और सभा के सभासद श्री जगन्नाथ मेहता द्वारा 1898 ई. में प्रकाशित एक पुस्तक से भी ज्ञात होता है कि "कोई देश जब तक उसमें विद्या का प्रचार न हो उन्नति नहीं कर सकता और उसका इस प्रान्त में बड़ा अभाव है। कारण इसका यही है कि जब तक यहाँ की मातृभाषा हिंदी का प्रचार न होगा विद्या की उन्नति न होगी, इसलिए सन् 1893 ई. में इस उद्देश्य से कि हिंदी भाषा और नागरी अक्षरों की यथोचित उन्नति और उनका पूर्ण प्रचार इस देश में हो और यह देश भी शिक्षा प्राप्ति में उन्नति करे नागरीप्रचारिणी सभा काशी में स्थापित की गयी है।"3

जिस समय नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना हुई उस समय भारत में शिक्षा अधोगति को प्राप्त हो रही थी जैसा कि सभा के सभासद श्री रामचन्द्र वर्मा ने लिखा "इस आर्यवर्त देश की अवनति और दुःखों का कारण एकमात्र अविद्या ही है बस जब यह सिद्ध हो गया कि अविद्या चाण्डाली ने ही इस पुण्यभूमि को पापभूमि बना दिया है तो हमको यह अवश्य मानना पड़ेगा कि इसको फिर पुण्यभूमि बनाने के लिए एकमात्र उपाय विद्या का प्रचार ही हो सकता है।"4 तत्कालीन भारत जीवन नामक प्रमुख समाचार पत्र से भी इस बात की पुष्टि हो जाती है जिसने ‘शिक्षा दोष से देश की हानि’ शीर्षक लेख में इसी प्रकार का मंतव्य प्रकाशित किया था कि "इस समय हमारे देश में तीन प्रकार की शिक्षा प्रचलित है-संस्कृत की, दूसरी महाजनी और तीसरी अंग्रेजी की।.......अब विचारना चाहिए कि जिस देश के शिक्षा के दोष से लाभ के बदले हानि हो रही हो उस देश की दशा जो दिनोंदिन हीन होती जायगी इसमें क्या आश्चर्य है।"5

 जिस समय सभा की स्थापना हुई उस समय भारत में अंग्रेजी शासन कायम था और भारतीय जनता विदेशी शासन के विरुद्ध संगठित एवं सचेत होने लगी थी। राजनीतिक साधना का चरम उद्देश्य देश के हृदय को एक करना होता है और शिक्षा इसका सबसे सुगम और सशक्त माध्यम होती है। शिक्षा के द्वारा ही देशवासियों में एक प्रकार का मनोभाव उत्पन्न किया जा सकता है-राष्ट्र के प्रति अनुराग तथा निष्ठा का मनोभाव, इस बात को सभा ने स्वीकार किया और शिक्षा के महत्व को प्रतिपादित करते हुए अपने वार्षिक विवरण में लिखा "केवल ज्ञान ही के द्वारा मनुष्य सर्वत्र खुशहाली और समृद्धि प्राप्त कर सकता है। भारतवर्ष ने प्राचीनकाल में जो उन्नति की थी वह समान भाषा एवं अद्वितीय शिक्षा पद्धति के बल पर की थी और उसकी उपेक्षा के कारण ही वह इस अधोगति को प्राप्त हुआ है।"6

सभा ने अपनी स्थापना काल से, जब वह मात्र बालकों की संस्था थी, भारत में नागरी के माध्यम से शिक्षा के प्रचार को महत्व दिया। 16 जुलाई, 1893 ई. की बैठक में सर्वसम्मति से जो निश्चय हुआ था उसके अनुसार ’सर्वत्र नागरी का व्यवहार, अन्य भाषा की पुस्तकों को नागरी में उत्थान करना, भारत के अन्य भागों में नागरीप्रचारिणी सभाओं को स्थापित करना और एकता का फैलाना’ इत्यादि बातें शामिल थीं।‘7

 शिक्षा के क्षेत्र में कार्य आरम्भ करते हुए 1894 ई. से सभा ने ’हिंन्दी हस्तलिपि परीक्षा का आयोजन आरम्भ किया। उन दिनों फारसी और रोमन लिपियों की परीक्षाएँ होती थीं एवं उसके लिए पारितोषिक दिये जाते पर नागरी लिपि, जिसमें उस समय भी देश की अधिकांश जनता अपना कार्य करती थी, सुध भी न ली जाती थी। अतएव, सभा ने इस उपेक्षा का अनुभव किया और 4 जून, 1894 ई. की बैठक में श्यामसुन्दरदास के प्रस्ताव पर वर्नाक्यूलर स्कूलों में उत्तम नागरी लिखने वाले छात्रों को पारितोषिक देने का निश्चय किया। इस सन्दर्भ में शिक्षा विभाग के डाइरेक्टर से पत्र व्यवहार किया गया और उन्होंने सभा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। सभा ने वर्नाक्यूलर स्कूलों के वि़द्यार्थियों को क्रमशः 10, 8 और 5 रु. के तीन पारितोषिक देना स्वीकार किया।8 सभा ने यह परीक्षा बनारस, गोरखपुर, बाद में समूचे पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में आयोजित करवायी। 1902 ई. से ग्वालियर में और 1904 ई. से कश्मीर राज्य में भी यह परीक्षा आयोजित की गयी।9 इस आयोजन द्वारा सभा ने मातृभाषा हिंदी के माध्यम से देशवासियों में शिक्षा के व्यापक प्रसार का प्रयास किया।

देशवासियों को नागरी के माध्यम से शिक्षित करने एवं उठती हुई राष्ट्रीयता की भावना को दृढ़ करने के उद्देश्य से 1896 ई. से ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ का प्रकाशन आरंभ किया और प्रथम अंक की प्रस्तावना में ही शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा "कोई देश तब तक सभ्य कहलाने का गौरव नहीं प्राप्त कर सकता जब तक उसने यथोचित विद्या की उन्नति प्राप्त न कर ली हो और विद्या की उन्नति तब तक सम्भव नहीं जब तक देश के कृतविद्य जनों का ध्यान आकर्षित न हुआ हो। इसी अन्योन्य संबंध को एक दूसरे में सहायता पहुँचाने के लिए ’काशी नागरीप्रचारिणी सभा’ का जन्म हुआ, क्योंकि इस देश की मातृभाषा हिंदी की उन्नति करना ही इस सभा का मुख्य उद्देश्य है।"10 इस पत्रिका ने प्रारम्भ से ही शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया। सरल हिंदी भाषा में इस पत्रिका में उच्चकोटि की सामग्री प्रकाशित की जाती थी। पत्रिका के दूसरे भाग में ही ’विद्याध्ययन’ शीर्षक लेख में विद्या के महत्व और उसके लाभ को विवेचित किया गया "विद्या माता के समान रक्षा करती है, पिता के समान हित में तत्पर रहती है, कांता के समान खेदित चित्त को प्रसन्न करके सुख देती है, सम्पत्ति को बढ़ाती है, कीर्ति को दिशाओं में फैलाती है,.......कल्पलता के समान यह विद्या क्या क्या नहींं साधन करती अथात् सभी करती है।"11

 1898 ई. में सभा ने एक ऐसा कार्य किया जो शिक्षा के क्षेत्र में चिरस्मरणीय रहेगा। इस वर्ष 2 मार्च, 1898 ई. को सभा ने पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध के लेफ्टिनेंट गवर्नर की सेवा में सरकारी दफ़्तरों और न्यायालयों में देशभाषा नागरी के व्यवहार के लिए ’नागरी मेमोरियल’ एवं उसके साथ 16 जिल्दें, जिसमें इस प्रांत की सब जाति और सब श्रेणी की प्रजा के 60 हज़ार लोगों के हस्ताक्षर और पं. मदन मोहन मालवीय, वकील, हाईकार्ट एवं प्रतिनिधि ना. प्र. सभा द्वारा लिखित "कोर्ट कैरेक्टर ऐंड प्राइमरी एजूकेशन इन नार्थ वेस्टर्न प्राविंस ऐंड अवध” नामक अति महत्वपूर्ण एक पुस्तक भी बँधी हुई थी, उपस्थित किया।12 मेमोरियल में यह मत स्थापित किया गया था कि सभ्य संसार के किसी भी जनसमुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है। केवल यही एक ऐसा देश है जहाँ सरकारी दफ़्तरों और न्यायालयों की भाषा न तो शासकों की मातृभाषा है और न प्रजा की।13 साथ ही विभिन्न प्रमाणों एवं आंकड़ों के आधार पर यह प्रमाणित किया गया था कि नागरी अक्षरों का प्रचार अत्यन्त प्राचीन काल से ही इस देश में था और समस्त कार्य उसी के द्वारा संचालित किया जाता था।14

सभा ने नागरी अक्षरों को अदालतों में स्थान दिलाने के लिए बहुत बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया। कतिपय विरोधियों ने, जिसमें कुछ फारसी परस्त हिन्दू और मुसलमान थे, इस उद्योग का विरोध किया परन्तु कितने ही सुयोग्य मुसलमानों ने, जिनमें हैदराबाद के तत्कालीन मंत्री विद्वान सैयदअली बिलग्रामी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, इस कार्य में सभा का पूर्ण समर्थन किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया था कि "मुसलमानों में शिक्षा का कम प्रचार होने का मुख्य कारण बेढंगी फारसी लिपि ही है। इसे ठीक तरह सें सीखने के लिए जहाँ कम सें कम दो वर्ष चाहिएँ वहाँ नागरी के लिए महीनें दो महीनें ही पर्याप्त होते हैं”15

इस प्रकार तीन वर्ष तक निरंतर उद्योग करने पर सभा को आंशिक सफलता 18 अप्रैल, सन् 1900 ई. को प्राप्त हुई जब पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध की सरकार ने अपने आज्ञापत्र सं. 585/3-343सी-68, 1900 द्वारा कचहरियों में नागरी अक्षरों में आवेदन पत्र दाखिल करने की आज्ञा दे दी तथा अन्य आदेश भी इस सन्दर्भ में प्रकाशित किये।16 इस आज्ञा से मातृभाषा में प्रायमरी शिक्षा के प्रचार को अत्यधिक बल मिला और सभा नागरी अक्षरों को कचहरियों में प्रवेश दिलाने में सफल रही।

जनवरी, 1900 ई. से इंडियन प्रेस, प्रयाग से ‘सरस्वती’ नाम की जो पत्रिका सभा के तत्वावधान में प्रकाशित हुई उसने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। इस पत्रिका का आदर्श वाक्य ही था "सरस्वती त्रुति महती न हीयताम्” अर्थात "सरस्वती ऐसी महती त्रुति है जिसका कभी नाश नहीं होता।" इस पत्रिका ने हिन्दी भाषा में विविध विषयों की सामग्री जन-जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। पत्रिका में दिसम्बर, 1900ई. में एक लेख ‘भारतवर्ष की शिल्पविद्या’ प्रकाशित हुआ, जिसमें किस विधि से भारत ग़रीब हुआ, यहाँ की कारीगरी कैसे नष्ट हुई, इसमें सरकार एवं व्यापारियों की क्या भागीदारी थी एवं भारत पुनः कैसे समृद्ध हो सकता है, इत्यादि का तथ्यात्मक विवेचन किया गया।17

 सरस्वती पत्रिका ने शिक्षा को कितना महत्व दिया यह 1902 ई. में प्रकाशित ‘शिक्षा’ शीर्षक लेख से ही स्पष्ट हो जाता है जिसमें शिक्षा को अविद्या, अशिक्षा, अज्ञानता और असमानता को दूर करने वाली ऐसी ज्ञान राशि के रूप में व्याख्यायित किया गया जो मनुष्य को उसकी आत्मा का दर्शन कराती है। इस लेख में यह दिखाया गया कि अधोपतित जातियों की सांसारिक अवस्था के परिवर्तन के साथ वर्तमान अवस्था के अनुकूल बनाना आवश्यक है। राष्ट्र की उन्नति के लिए सामान्य शिक्षा, वैज्ञानिक शिक्षा और शिल्प शिक्षा अनिवार्य हैं एवं शिक्षा द्वारा ही मस्तिष्क की शक्तियाँ शास्त्र और विज्ञान से परिमार्जित होकर जाति उन्नति संभव कर पाती हैं।18

1885 ई. से 1902 ई. के बीच की अवधि में भारत में राष्ट्रवाद की भावना बढ़ती जा रही थी अतएव लार्ड कर्ज़न ने शिक्षा पर नियंत्रण रखन एवं अपने कार्यों में सहयोग के उद्देश्य से ब्रिटिश भारत के विश्वविद्यालयों की दशा एवं पाठ्यक्रम की जाँच करने और उनकी अवस्था एवं कार्यप्रणाली में सुधार पर सुझावों को प्रतिवेदित करने के लिए 27 जनवरी, 1902 ई. को एक ‘कमीशन’ नियुक्त कर दिया। इस कमीशन ने मद्रास, पूना, बम्बई, कलकत्ता आदि स्थानों में जाँच का काम किया। कमीशन ने नागरीप्रचारिणी सभा से भी साक्षी के लिए एक सदस्य माँगा।19

काशी नागरीप्रचारिणी सभा के प्रतिनिधि तथा उपसभापति बाबू गोविन्ददास ने 2 अप्रैल, 1902ई. को काशी में कमिश्नरों के सम्मुख सभा की ओर से गवाही देते हुए बाबू गोविन्ददास ने कहा था "विश्वविद्यालय के मुख्य उद्देश्य (1) विद्या की उन्नति करना और (2) उसका प्रचार करना है। इन दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के लिए विश्वविद्यालयों को शिक्षक और परीक्षक दोनों ही होना चाहिए। जो विद्यार्थी भारतवर्ष के विश्वविद्यालयों की परीक्षा देना चाहते हैं, उन्हें किसी संयुक्त विद्यालय में पढ़ना पड़ता है। अतएव भारतवर्ष के विश्वविद्यालय एक प्रकार से शिक्षक भी है। जब लण्डन का विश्वविद्यालय केवल परीक्षा ही लेता था, तब वहाँ यह बात नहीं थी, अतएव आजकल भारतवर्षीय विश्वविद्यालयों में और लण्डन और आक्सफोर्ड के विश्वविद्यालयों में मुख्य भेद यहीं है कि यहाँ विद्यालय देश भर में सर्वत्र बने हुए हैं परन्तु वहाँ उनके केन्द्र केवल मुख्य-मुख्य नगरों में ही हैं।‘20

बाबू गोविन्ददास ने यह मत भी उपस्थित किया कि स्नातक विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जाय और साथ ही वे विविध विषयों पर जनता के समझने योग्य व्याख्यान उन्हीं की भाषा में दें जैसे कि इंग्लैण्ड आदि देशों में विश्वविद्यालय के ‘एक्सटेंशन सिस्टम’ में किया जाता है।21

सभा की साक्षी को सुनकर कमिश्नर लोग बड़े खुश हुए पर उसकी किसी भी बात को 1904 के ‘विश्वविद्यालय अधिनियम’ में स्थान नहीं दिया बल्कि इस अधिनियम से विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियन्त्रण बढ़ा दिया गया। वास्तव में कर्ज़न महोदय जो चाहते थे, वहीं किया। जब कमीशन नियुक्त हुआ था तभी भारत जीवन ने अप्रैल, 1902 ई. में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि ".............यों तो अभी कमीशन के आगे जो लोगों को उचित जँचा वही कहा परन्तु अंत होना वही है जो श्रीमान् बड़े लाट बहादुर ने विचारा है और वही हमारे देशवालों के भाग में लिखा है।"22 और वास्तव में अक्षरशः वही हुआ।

1905 ई. में बंगाल-विभाजन के बाद शुरू हुए ‘स्वदेशी और बहिष्कार आन्दोलन’ के साथ ही ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ का सिद्धान्त भी सामने आया और जातीय अभ्युदय के उद्देश्य से जातीय शिक्षा का प्रचार आरम्भ किया गया तो काशी की इस सभा ने इसमें उत्साह से भाग लिया। 3 अक्टूबर, 1906 को सभाभवन में ‘स्वदेशी आंदोलन’ पर एक सभा का आयोजन किया गया। सेंट्रल हिंदू कालेज, बनारस के प्रिंसिपल जार्ज एस. अरण्डेल को सभापति बनाया गया। इस सभा में सभापति के अतरिक्त बाबू हीरेन्द्रनाथ दत्त, चारूचन्द्र बोस, रामदयाल मजूमदार और मालवीय जी सदृश विद्वानों के स्वदेशी विषय पर व्याख्यान हुए और लोगों को स्वदेशी का गुण बताया गया। "स्वदेशी भारत की उन्नति की एक सीढ़ी है; स्वदेशी बँटी हुई शक्तियों को संयुक्त करने वाला विषय है।"23 ऐसी बातें व्याख्यानकर्ताओं ने लोगों के सामने रखीं।

 जिस समय ‘स्वदेशी और बहिष्कार आन्दोलन’ अपने पूर्ण वेग पर था उसी समय नागरीप्रचारिणी सभा के सभासद एवं अधिकारी माधवराव सप्रेजी ने ‘स्वदेशी आन्दोलन और बायकाट’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें अन्य अनेक बातों के अलावा शिक्षा की भी चर्चा की गई और लेखक ने बड़ी दृढ़ता के साथ इस बात को स्थापित किया कि विदेशी शासकों द्वारा हमारे देशवासियों को स्वतंत्रता और नैतिक विषयों की शिक्षा नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे देशवासियों की उन्नति एवं परस्पर संबंध की भावना मजबूत होगी। लेखक ने लिखा "जिस देश में, न्याय करने वाले न्यायाधीश और शिक्षा देने वाले गुरू राज सत्ताधिकारियों के अधीन रहते हों, उस देश में न तो यथार्थ न्याय हो सकता है और न सत्य-विद्या प्राप्त हो सकती है। न्याय देवता की स्वाधीनता और गम्भीरता, तथा सरस्वती देवी की रमणीयता और महिमा तभी तक पवित्र रह सकती है जब तक वह राज सत्ताधिकारियों के दास या दासी न हों। यह बात तो मनुष्य स्वभाव ही के विरुद्ध है कि विजयी लोग, पराजित लोगों को, राष्ट्रधर्म के स्वतंत्र तत्वों की शिक्षा दें।"24

1910 ई. में सभा द्वारा स्थापित ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के पहले ही अधिवेशन में शिक्षा के प्रसार को महत्व दिया गया और चौथा ही प्रस्ताव इस सन्दर्भ में पास हुआ कि ‘यूनिवर्सिटी कमीशन की सम्मति स्कूल, कालेजों में देश भाषाओं की पढ़ाई के पक्ष में होने पर भी व्यवहार में ऐसा नहीं किया जाता। युक्त प्रांत में रूड़की इंजिनियरिंग कालेज और कानपुर के एग्रीकल्चरल कालेज में परीक्षा पास करने के लिए जिस प्रकार उर्दू आवश्यक कर दिया गया है उसी प्रकार हिंदी को भी स्थान दिया जाय।‘25 इतना ही नहीं छठा प्रस्ताव श्यामसुन्दरदास का यह भी पास हुआ कि ‘भिन्न-भिन्न प्रांतों के स्कूलों में और पाठशालाओं में हिंदी पढ़ाने के लिए जो पुस्तकें नियत की जाती हैं उनके चुनाव के लिए उन प्रांतों की टैक्स्ट बुक कमेटियों में हिंदी की प्रधान सभाओं को अपना एक प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया जाय।‘26

1920 में असहयोग आन्दोलन के आरम्भ होने के साथ ही महात्मा गांधी ने कतिपय नेताओं के विरोध के बाद भी सरकारी स्कूलों और कालेजों के बहिष्कार का प्रचार आरंभ कर दिया। गांधी जी के प्रचार का देश के विद्यार्थियों पर प्रभाव पड़ा, सभी सरकारी स्कूल और कालेज बंद तो नहीं हो गये लेकिन बहुत से विद्यार्थियों ने उनमें पढ़ना बंद कर दिया। इस बीच कितने ही राष्ट्रीय विद्यालय खोले गये और सरकारी शिक्षा संस्थाओं को छोड़-छोड़ कर विद्यार्थी उनमें जाने लगे। गुजरात विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, बंगाल राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, कौमी विद्यापीठ, और अनेक अन्य राष्ट्रीय विद्यालय देश के विभिन्न भागों में स्थापित हुए। काशी की सभा ने इन विद्यालयों की स्थापना का जोरदार समर्थन किया क्योंकि इन विद्यालयों में भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी भाषा में शिक्षा दी जाती थी।27 इन सब बातों से भी महत्वपूर्ण यह कि सभा के सभासद एवं अपने नागरी प्रेम के लिए विख्यात बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने स्वयं काशी विद्यापीठ की स्थापना की।

अदालतों में नागरी के प्रवेश के लिए मिली आज्ञा के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में नागरीप्रचारिणी सभा ने अपना वार्षिकोत्सव तथा नागरी प्रचार उत्सव के साथ ही ‘शिक्षा दिवस’ का भी आयोजन किया। ‘शिक्षा दिवस’ का आयोजन 27 जनवरी, 1939ई. को पं. सीताराम चतुर्वेदी एम.ए., के सभापतित्व में मनाया गया जिसमें कई सौ लोगों की उपस्थिति थी। अन्य महत्वपूर्ण लोगों के अतरिक्त प्रो. लालजीराम शुक्ल और सभापति जी के महत्वपूर्ण व्याख्यान हुए।28

1935 के शासन विधान के अनुसार 1937 के चुनाव में कांग्रेस दल को भारी सफलता मिली। इस विधान के अनुसार कांग्रेस ने अपनी पूर्व घोषित नीति के अनुसार समूचे राष्ट्र के लिए शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दुस्तानी का प्रचलन किया जिसका नागरीप्रचारिण सभा ने विरोध किया क्योंकि वह और कुछ नहीं वरन् नागरी लिपि में लिखित उर्दू ही थी। इतना ही नहीं, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, एवं बिहार प्रांतों में जो रीडरें तैयार की गयी थीं, पर सभा ने क्षोभ प्रकट किया।29 इतना ही नहीं, 1938ई. की हरिपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से जब सुभाषचन्द्र बोस ने रोमन लिपि का समर्थन किया तब सभा ने इसका कड़ा विरोध किया और जब 1939 ई. में आसाम सरकार ने अपने पहाड़ी जिलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दुस्तानी की जगह रोमन लिपि का प्रयोग शुरू किया तब सभा ने आसाम के प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर अपना रोष प्रकट किया और लिखा "हिन्दुस्तानी सिखाने के लिए नागरी तथा अन्य सुन्दरतापूर्ण देशी लिपियों के होते हुए विदेशी लिपि का प्रयोग किया जाना बड़े दुःख की बात है।"30

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तब उस समय शिक्षा, भाषा, सभ्यता एवं संस्कृति सब एक नए मोड़ पर थे। इसी पृष्ठभूमि में 1948 ई. में डा. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में ‘विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग’का गठन किया गया। 1949 ई. में पेश हुई रिपोर्ट में शिक्षा-माध्यम के रूप में अंग्रेजी के पक्ष में प्रबल प्रमाण दिये गये थे। इतना हीं नहीं, विश्वविद्यालयों की शिक्षा के माध्यम के प्रश्न पर विचार हेतु हिंद के विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों- सर शांतिस्वरूप भटनागर एवं सुनीतिकुमार चटर्जी की समिति ने यह प्रस्ताव पास किया कि ‘शिक्षा का माध्यम 5 वर्ष तक अंग्रेजी रहे साथ ही माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को विधान परिषद द्वारा निर्धारित राष्ट्रभाषा में परीक्षा देना अनिवार्य होगा किन्तु इसका फल विद्यार्थी के शैक्षणिक जीवन में बाधक न होगा।’31

 काशी की नागरीप्रचारिणी सभा ने शिक्षा आयोग के 5 वर्ष तक अंग्रेजी के शिक्षा माध्यम रहने की अनुशंसा का तीव्र विरोध किया और 1 ज्येष्ठ, सं0 2005 के अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास करके केन्द्रीय सरकार के पास भेजा जिसमें निश्चय किया गया था कि "यह सभा भारत सरकार द्वारा आहूत भारतीय विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों के उस निश्चय के प्रति हार्दिक खेद प्रकट करती है जिसमें आगामी 5 वर्षें तक अंग्रेजी का शिक्षा माध्यम रखना स्वीकार किया गया है। यह निर्णय भारत के मर्यादा के विपरीत एवं उसकी भविष्योन्नति के लिए घातक है। अतएव यह सभा भारत-सरकार से आग्रहपूर्वक यह माँग करती है कि उपर्युक्त निर्णय रद्द करके नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी को उच्च शिक्षा का माध्यम स्वीकार करे।”32

इस प्रकार काशी की नागरीप्रचारिणी सभा अपने जन्म के समय से ही देशभाषा हिंदी के माध्यम से देशवासियों में शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार का प्रयास किया। एक तरफ जहाँ देशवासियों में हस्तलिपि परीक्षा के माध्यम से शिक्षा का प्रचार किया वहीं नागरी को कचहरियों में स्थान दिलाया तथा उसी के माध्यम से देशवासियों को शिक्षित करने का सुझाव ‘युनिवर्सिटी कमीशन’ को दिया। स्वदेशी, असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलनों के दौरान शिक्षा का व्यापक प्रचार किया। यहाँ तक कि स्वतंत्र भारत में भी देशवासियों को देशभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जाय, इसका पुरजोर प्रयास किया और अंत तक संघर्ष जारी रखा। यद्यपि स्वतंत्रता के चढ़ते सूरज के आलोक में अंग्रेजी की छाया बढ़ती गई फिर भी सभा ने हिंदी के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किया और अपने कार्यों द्वारा एक प्रतिमान स्थापित किया।

डॉ. राकेश कुमार दूबे
पी. डी. एफ.,
इतिहास विभाग,
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी
rkdhistory@gmail.com

 संदर्भ सूची:

1. शास्त्री, वेदव्रत, नागरीप्रचारिणी सभा का अर्द्ध-शताब्दी का इतिहास, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं0 2000 वि., पृष्ठ 5
2. दि रिपोर्ट आफ दि नागरीप्रचारिणी सभा आफ बनारस फ्राम 1893-1902, नागरीप्रचारिणी सभा, बनारस, 1902, पेज 3
3. पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध के न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों में नागरी अक्षरों का प्रचार, चन्द्रप्रभा प्रेस कम्पनी लिमिटेड, काशी, 1898ई., पृष्ठ 1
4. विद्या का महत्व, आर्यन् टेक्स सुसाइटी, मेरठ, प्रथम सं0 1897 ई., पृष्ठ 2
5. भारत जीवन 28 नवम्बर, 1898 ई., भारत जीवन कार्यालय, वाराणसी, पृष्ठ 3-4
6. दि रिपोर्ट आफ दि ना.प्र. सभा आफ बनारस फ्राम 1893-1902, पेज 1
7. भारत जीवन 14 अगस्त, 1893 ई., पृष्ठ 7
8. नागरीप्रचारिणी सभा का द्वितीय वार्षिक विवरण, 1894-95, पृष्ठ 6
9. शास्त्री, वेदव्रत, नागरीप्रचारिणी सभा का अर्द्ध-शताब्दी का इतिहास, पृष्ठ 152
10. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग-1, 1897 ई. पृष्ठ 1
11. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग-2, 1898 ई., पृष्ठ 111
12. भारत जीवन 5 मार्च, 1898 ई., पृष्ठ 7; पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध के न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों में नागरी अक्षरों का प्रचार, हरिप्रकाश यंत्रालय, बनारस, 1898ई., निवेदन, पृष्ठ 1
13. वही, पृष्ठ 129
14. वही, पृष्ठ 17
15. सरस्वती पत्रिका, भाग-1, संख्या-4, 1900 ई., इंडियन प्रेस, इलाहाबाद, पृष्ठ 126-127
16. सरस्वती पत्रिका, भाग-1, संख्या-12, 1900 ई., पृष्ठ 378
17. सरस्वती पत्रिका, भाग-3, संख्या-7 1902 ई., पृष्ठ 239
18. भारत जीवन, 7 अप्रैल, 1902 ई., पृष्ठ 6
19. सरस्वती पत्रिका, भाग-3, संख्या-4, 1902 ई. ,पृष्ठ 119-120
20. वही, पृष्ठ 121
21. भारत जीवन, 7 अप्रैल, 1902 ई., पृष्ठ 4
22. भारत जीवन, 8 अक्टूबर 1906, पृष्ठ 5
23. सप्रे, माधवराव, स्वदेशी-आन्दोलन और बायकाट, माधवराव लिमये, सीतावर्डी, महाराष्ट्र, 1906, ई., पृष्ठ
50
24. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, काशी का कार्य विवरण, पहला भाग, हितचिंतक प्रेस बनारस सीटी, 1911 ई.
पृष्ठ 37
25. वही, पृष्ठ 41
26. नागरीप्रचारिणी सभा का 29वां वार्षिक विवरण, 1921-22 ई., पृष्ठ 21
27. नागरीप्रचारिणी सभा का 46वां वार्षिक विवरण, 1938-39 ई., पृष्ठ 38
28. वही, पृष्ठ 55-56
29. वही, पृष्ठ 51
30. वही, पृष्ठ 55-56
31. आज, 4 मई, 1948, ज्ञानमंडल कार्यालय, वाराणसी, पृष्ठ 1
32. वार्षिक विवरण, नागरीप्रचारिणी सभा 2005 विक्रमी, पृष्ठ 35


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