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ISSN 2292-9754

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06.18.2016


वृक्षवैभव
कवि : स्वर्गीय ज्योतिष महेता
अनुवादक : डॉ. रजनीकान्त शाह
(मूल गुजराती से हिन्दी अनुवाद)

पात पात जब कूजन फूटे,
मुझे कोंपल कोंपल दंश लगे।
डाल डाल मेरी नीड़ बने
तो हरीभरी सारी उम्र लगे।
कलरव, केकारव, कूहुक और चींचीं
गूँजे कान में जहाँ हर साँझ
संगीतसंध्या मेरे संग रंग में आई
मानो, मन में रोज़ मुझे लगे।
किसी महल के कमरे, ये नीड़ मानों।
और पंछीगण राजकुमार लगे।
बंदर कूदकर तोड़े यदि नीड़,
तो मन में दु:ख अनहद जगे।
वे बेचारे भी जाएँ तो कूदने कहाँ?
बिजली के तार हैं सर्वत्र लगे।
जंगल और सिवान तो कर दिये विदा दूर-सुदूर,
सीमेंट के पेड़ जाएँ सर्वत्र बोये।
समझदार है मानुष तो समझता नहीं क्यों?
समस्या का अंत लाता नहीं क्यों?
वृक्ष और जंगल का करके जतन
पर्यावरण बचाता नहीं क्यों!


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