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ISSN 2292-9754

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03.12.2017


मेरा भी कोई घर होगा ना माँ

मेरा भी कोई घर होगा ना माँ
जैसे बचपन में सिखाया करती थी तुम
संसार के हर जीव का अपना एक घर होता है
जैसे शेर रहता है जंगलों में
साँप, बिच्छु रहते है मिट्टी में
घर के पास दिखने वाली वह चिड़िया
का घर है उस डाल पर
वैसे ही मेरा भी कोई घर होगा ना माँ
याद है मुझे माँ
बचपन में तुम पूरी करती थी मेरी हर ग़लत ज़िद्द
तब दादी टोका करती थी तुम्हें
इसे सर पर मत चढ़ाओ –
जहाँ जाएगी वहाँ नहीं सहेगा कोई इसके नखरे
तब मैं दादी को मुँह चिढ़ाते हुए…
भाग जाया करती थी वहाँ से
लेकिन पूछती थी तुमसे
आख़िर उस एक दिन कहाँ जाना है मुझे
मेरा जन्म, यहीं इसी घर में तो हुआ है
छुटपन में इन्हीं दीवारों पर
बनाती थी आड़ी तिरछी रेखाएँ
तब ग़ुस्से में कितना डाँटा करती थी ना तुम माँ
लेकिन छू हो जाता था तुम्हारा ग़ुस्सा
जब आड़ी तिरछी रेखाओं में बनाती थी मैं
तुम्हें, भाई, पापा, मैं और हमारा छोटा सा घर
लेकिन आज मेरी सँभली हुई पेंटिंग भी
नहीं कम कर पाती तुम्हारी झल्लाहट
जो महसूस करती हो तुम
मेरे हाथ के बने बेस्वाद खाने से
अब पूरी नहीं करती मेरी कोई लायक़ ज़िद्द भी
मैंने भी छोड़ दिया है ज़िद्द करना
जबसे पराया धन,
दूसरे की अमानत जैसे वाक्यांश
अपना यथार्थ समझाने लगे हैं मुझे
लेकिन माँ –
मैं कोई धन या अमानत कैसे हो सकती हूँ
मैं एक इंसान हूँ ना
तुम हवाला देती हो कि
यह सदियों से चली आई रीत है
तो माँ सदियों से चला आने का तर्क
तथ्य के सही होने का पैमाना गढ़ती है?
गर हाँ तो बाईस साल यह घर भी –
गवाह रहा है मेरी हँसी मेरे आँसुओं का
लेकिन फिर भी यह घर मेरा अपना नहीं!
तो कहाँ है माँ मेरा अपना घर?
जहाँ पूरी होगी मेरी हर बेईमानी ज़िद्द
जहाँ किसी की हाँ पर निर्भर न रहे मेरे फ़ैसले
मेरा भी कोई घर होगा ना माँ...


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