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ISSN 2292-9754

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05.06.2017


मैं नकारती हूँ प्रेम

मैं नकारती हूँ उसे प्रेम कहने से
जब तुम क़ुबूल न कर सके मेरा इंकार
पुरज़ोर कोशिश करते रहे –
मेरी "नहीं" को "हाँ" में बदलने की
तुम्हारी हर असफलता
तब्द़ील होती रही एक आत्मकुंठा में
रचते रहे तुम
अपने इर्दगिर्द नफ़रत का घिनौना व्यूह
"कि जो मेरी नहीं, वो किसी की नहीं हो सकती"
रंडी,बदचलन, वेश्या जैसे उपनामों से –
करते रहे मेरा चरित्र निर्धारण
फेंका मुँह पर तेज़ाब या घोंप दिया सीने में चाकू
जिस चेहरे और दिल पर कभी आत्ममुग्ध थे तुम
बेइंतहा ख़ुशियाँ देने का जिसे,
ख़ुद से वादा किया था तुमने
काट दी, उसी की ज़िंदगी की ड़ोर
शान से क़ुबूल भी लिया तुमने जुर्म,
लेकिन न अपना सके मेरा एक "नहीं"
क्या तुम्हारी नज़र में यही प्रेम है...?

गर हाँ, तो धिक़्कार है ऐसे प्रेम को
प्रेम के इस प्रपंच को
प्रेम तो निस्वार्थ आराधना है…
एक मूक संवाद है
दैहिक उपभोग से परे –
दिलों का पवित्र संगम है
प्रेम उस वृक्ष में है
जो कष्ट सहन कर भी…
सुरक्षा देता है राहगीर को
धूप, बारिश, तूफ़ान से
प्रेम दीपक की उस लौं में है
जो स्वयं जलकर भी
रोशन करता है घर का इक इक कोना
तुम समझ सकते प्रेम,
जिसका दावा किया था तुमने
तो शायद इस तरह
बर्ब़ाद न होती कई ज़िंदगियाँ...


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