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ISSN 2292-9754

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03.28.2017


कैसे होते हैं वह अच्छे घर

मेरा "मैं" मुझमें ज़िन्दा नहीं रहता
जब घड़ी की सुईयाँ दिखाने लगती हैं
शाम के सात
मैं कहीं दूर किसी काम में फँसी –
महसूस करती हूँ माथे की सिलवटों में
घबराहट की हदों को

मेरा सूखता गला तलाशता है तब
उस सोच के विपक्ष में तर्क
कि अच्छे घरों की लड़कियाँ…
नहीं घूमा करती ऐसे
साँझ ढलते लौट आना चाहिए तुम्हें
अन्यथा बैठो घर में चुपचाप...
किसी पालतू जानवर की तरह
देहरी पर बँधे रहने की
दी जाती हैं नसीहतें

बोलती लड़कियों से –
दरकते हैं रिश्ते और घर
तब मेरे तर्क बग़ावती
हो जाना चाहते हैं मुझसे
अच्छे घर की लड़कियाँ कैसी होती हैं?
कैसे होते हैं वह अच्छे घर?
जहाँ स्वीकार नहीं मेरे –
बेवक़्त लौटने की कोई लायक वजह
वहीं सहजता से अपना लिया जाता हैं
लड़कों का वक़्त बेवक़्त घर को लौटना
असमानता की नींव पर बने ये आलीशान घर
सचमुच होते हैं अच्छे घर...

उलाहनाओं के बीच भी लगातार खोजती हैं
अपने हिस्से की धूप...


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