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ISSN 2292-9754

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12.27.2018


अन्तरमन

पता है तुम्हें
अक्सर जब बेचैन हो उठती हूँ
तब सोचती हूँ कि पल भर लेट कर
तुमसे जी भर के बातें करूँ
लेकिन तब नज़र पड़ती है-
बिस्तर के बेतरतीब बिखरे हुए कपड़ों पर
जिन्हें कुछ देर पहले ही
तय करके रखा था तयख़ाने में
उन कपड़ों को सहेज कर रखते समय नज़र गई
हाथ के निशान पर
जो जले थे कचोड़ियाँ तलने वक़्त
तब छनछनाती हुई उँगलियों को
भिगो लिया था पानी में
और अगले क्षण ही सब भूल कर
चेहरे पर मुस्कुराहट लिए फिर से लग गई
सबका ख़्याल रखने की कोशिशों में
देखो ना,
अब रोटियाँ यूँ ही बन जाती हैं गोल
दाल में नमक भी नहीं पड़ता कम या ज़्यादा

लेकिन इन सब में
न बिता सकी फ़ुर्सत के दो पल
तुम्हारे संग,
“तुम” जो “मैं” थी
हम घंटों बतियाते थे
देश दुनिया से लेकर
हाल-ए-दिल
तुम्हारे शब्दों से मिलती थी
मेरे हर अहसास को-
एक नयी पहचान
तुम तो अब भी आती हो
झाँकती हो मन की खिड़की से
मैं ख़ुशी से बुलाना चाहती हूँ तुम्हें
लेकिन तभी याद आती है
बिजली का बिल भरने की
आज आख़िरी तारीख़ है।
तब तुम्हारी मौजूदगी को अनदेखा कर
माथे पर थकान की सिलवटें लिए
लपकती हूँ पैसों का हिसाब-किताब करने
इसी तरह गुज़र गए
कई दिन... महीने... साल...
अब तो मैं भूला चुकी हूँ तुम्हारा अस्तित्व
और शायद अपनी पहचान भी...


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