अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
03.26.2014


अपनी माटी

बस्ती में रह के,
जंगल के लिए
मन मयूर
कसकता है।

इस देहाती मन का
क्या करूँ
अपनी माटी की
महक को तरसता है।

कैसे भूल जाऊँ
अपने गाँव को
रिश्तों की
सौंधी गलियों में
वहाँ अपनेपन का
मेह बरसता है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें