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ISSN 2292-9754

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03.04.2016


राधा विदा हो गयी

मज़दूरों की बस्ती से रोज़ लड़ने-झगड़ने की आवाज़ें सुनायी देतीं। कभी रात को कोई सड़क पर ही दारू पीकर गिरा-पड़ा होता, तो कोई दारू के नशे में ज़ोर-ज़ोर से गालियाँ दे रहा होता। कोई अपनी औरत से दारू के लिए पैसे माँग रहा होता, ना देने पर लात घूसों से मार-मार कर उसको अधमरा कर देता।

"साली ज़बान चलाती है, औरत है औरत की तरह रह।" चाहे वह ख़ुद शराब पीये या सारा दिन घर में बैठे गाली दे, है तो आख़िर मर्द! औरतें भी कहाँ डरने वाली थीं। काम करती हैं, खाली थोड़े ही बैठी हैं, कैसे सुन लें! औरतें भी अपना ग़ुस्सा आपस में ज़ोर-ज़ोर से लड़-लड़ कर निकालतीं। चारों ओर बच्चों का शोर फैला होता। उनकी गालियाँ सुन-सुन कर राह चलते लोग कानों में उँगली डाल लेते।

लेकिन आज मज़दूरों की बस्ती में बड़ी रौनक छाई हुई थी। आज बस्ती में धनिया की बेटी राधा की शादी थी। राधा का बाप तो राधा की माँ को छोड़ कर दूसरी शादी करके जाने कहाँ था। अब सारी ज़िम्मेदारी धनिया पर थी। पर ग़रीब की बेटी आज सारी मोहल्ले की बेटी बनी हुई थी। सब लोग धनिया के घर काम कर रहे थे। बराती कहीं कोई कमी ना निकाल दें। आख़िर मोहल्ले की नाक का प्रश्न था।

राधा विदा हो रही थी, सब हाथ जोड़े बारातियों से राधा को ख़ुश रखने के लिए प्रार्थना कर रहे थे। सारी बस्ती उदास थी। सबकी आँखों में आँसू थे। रोज़ वह दारू के नशे में लड़ते थे। भले ही रोज़ गाली देते थे। लेकिन वह भी क्या करें यही ज़िंदगी बचपन से उन्होंने देखी थी। ग़रीबी और अशिक्षा के कारण, दारू के नशे में रोज़ लड़-लड़ कर वह भूल गये थे कि वह भी एक इंसान हैं। उनके अंदर एक प्यारा सा दिल भी है। लेकिन आज राधा की विदाई ने, राधा ने सब की बेटी बन कर उनके मन का मैला धो कर उन्हें फिर से उजला कर दिया था।


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