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ISSN 2292-9754

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01.01.2016


दूर भले हो मंज़िल तेरी

दूर भले हो मंज़िल तेरी,
विपदा भले ही हो घनेरी।
थक के राही रुक ना जाना,
हिम्मत से तू कदम बढ़ाना।

पथ के शूलों को फूल बनाना
मन की पीड़ाओं को भूल जाना
फिर उम्मीदों की कली खिलेगी
मंज़िल तुझको ज़रूर मिलेगी।

चाहे कितना हो अँधेरा,
चाहे कितना दूर सवेरा।
नहीं पराजय से घबराना,
जीत तुझको ज़रूर मिलेगी।

तू मानव है आगे बढ़ना,
तेरा तो है काम यही।
मानवता का प्रकाश फैलाना,
मुक्ति तुझको ज़रूर मिलेगी|


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