अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.01.2016


आख़िर कब तक

आख़िर कब तक,
शब्दों को मेरे
तुम बंदी बना पाओगे
एक ना एक दिन
तो तुम्हारे द्वारा
चिनी गयी ये
रूढ़ियों की दीवारें
मेरे विचारों की
तेज़ आँधियों से
टूट कर गिर जाएँगी

मेरे शब्द उड़ने लगेंगे
दूर-दूर तक हवा में
करने लगेंगे फूल-पत्ती,
नदी पर्वत से संवाद
कण-कण से टकराएँगे
दूर-दूर तक फैल जाएँगे
धरती से अंबर तक

और फिर होगा
नया एक प्रभात
रूढियों से मुक्त समाज
लिखेगा एक नया इतिहास।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें