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ISSN 2292-9754

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01.06.2016


आँखों देखा ईरान
मूल लेखक: प्रो. अमृतलाल “इशरत”
अनुवादक: राजेश सरकार

आँखों देखा ईरान
प्रो.अमृतलाल “इशरत”
मेरा यह प्रयास समर्पित है, ईरान के उन नवयुवक छात्र-छात्राओं के नाम
जिन्होंने लोकतन्त्र, मानवता एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष
करते हुये अपने प्राणों की आत्माहुति कर दी।

प्राक्कथन

भारत (यदि पाकिस्तान खुद को इस उपमहाद्वीप की संस्कृति का अटूट हिस्सा माने तो) का
सब से पहला पड़ोसी ईरान, जो अपने गौरवशाली अतीत, संस्कृति-सभ्यता और रहस्यमयता की वज़ह से हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है। आज पूँजीवाद और अमेरिका द्वारा प्रायोजित बाज़ारवाद ने एक ऐसे अजीबो-ग़रीब परिदृश्य का निर्माण कर दिया है, जिसमें हम अपने सबसे नज़दीक वालों से सबसे दूर और दूर वालों से सबसे नज़दीक हो गए हैं। हम अपने पड़ोस के बारे में या तो कुछ नहीं जानते या कुछ दूसरा ही जानते हैं। शायद यही हमारी सबसे बड़ी विडम्बना है। भारत और ईरान सांस्कृतिक ऐतिहासिक रिश्तों की पड़ताल करने में इतिहासकारों की दूर तक पहुँच जाने वाली निगाहें भी तह तक पहुँचने में नाकाम रही हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लगभग चार वर्षों से फ़ारसी के अध्ययन करने के क्रम में ईरान को जितना जान सकता था, जानने की कोशिश की। अपने गुरु डॉ. सैयद हसन अब्बास (अध्यक्ष फारसी विभाग, काहिविवि), डॉ. रजनीश विज (शोधछात्र तेहरान विश्वविद्यालय, संप्रति गृहमंत्रालय, भारत सरकार में कार्यरत) एवं ईरानी मित्रों से ईरान के बारे में बहुत कुछ जानने की कोशिश की। इस अनुवाद के पूर्व ईरान और ईरान की यात्रा से संबन्धित कई किताबें पढ़ीं जिनमें कुछ उल्लेखनीय रहीं जिनमें एशिया के दुर्गम भूखंडों में-महापण्डित राहुल सांकृत्यायन, मेरी ईरान यात्रा-मौलवी महेश प्रसाद, मेरी ईरान यात्रा मौलवी महेश प्रसाद (उर्दू अनुवाद)- डॉ.सैयद हसन अब्बास, चलते तो अच्छा था (ईरान एवं आज़रबाईजान की यात्रा)-असग़र वजाहत, आज का ईरान-शीरीन इबादी वग़ैरा। इन किताबों में अलग-अलग दौर के ईरान के हालात का जायज़ा लिया गया है।

यह अनुवाद मशहूर विद्वान, शायर प्रो.अमृतलाल ‘इशरत’ की किताब “ईरान सदियों के आईने में" के कुछ अंशों पर आधारित है। जिसमें आप ने 1967 ई. में आपके द्वारा की गई ईरान यात्रा के रोचक पहलुओं से अवगत कराया है। यह वह दौर था, जब रज़ा शाह पहलवी का शासन ईरान पर चल रहा था। जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति आइज़नहावर ने मोसद्दिक़ की जननिर्वाचित सरकार को एक सैन्यकार्यवाही के ज़रिये हटाकर बैठाया था। जहाँ ईरान का सबसे उज्ज्वल पक्ष उसका आधुनिक युग में प्रवेश था, वहीं अमेरिका एवं अन्य यूरोपीय शक्तियों का वर्चस्व दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। पेट्रोलियम की सियासत शुरू हो चुकी थी। वह दौर, जो उनके द्वारा देखा और महसूस किया गया, हम सभी के लिए विशेष महत्त्व रखता है।

इस अनुवाद की भाषा पर मैंने अपने मित्र राजन राय (मास्टर ऑफ एजुकेशन, काहिविवि) जो ख़ुद उर्दू- फ़ारसी के अच्छे जानकार हैं, से चर्चा की। उन्होंने मुझे इसकी भाषा सरल सहज रखने को कहा। उस हिन्दी का प्रयोग करने की सलाह दी, जिसे आम तौर पर हिन्दुस्तानी कहा जाता है। पूरी तरह से स्पष्टता के लिए परिशिष्ट का भी प्रयोग किया गया है।

इस यात्रा वृत्तान्त के अनुवाद में मेरे द्वारा लेखक की मूल भावना को अक्षुण्ण रखने की पूरी कोशिश की गई है, फिर भी अनुभवहीनता आड़े आती रही। इस प्रयास से आपकी थोड़ी भी रुचि जुड़े, यह मेरे लिए सुखद होगा। इन्ही शब्दों के साथ ..........................................

राजेश सरकार

- क्रमश

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