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ISSN 2292-9754

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04.26.2016


आँखों देखा ईरान
मूल लेखक: प्रो. अमृतलाल “इशरत”
अनुवादक: राजेश सरकार

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 ईरान और भारत के नए पुराने सम्बंध

 ईरान और भारत के सम्बन्ध इतने प्राचीन हैं कि इतिहासकारों की दूर-दूर तक पहुँच जाने वाली निगाहें भी उनका सुराग़ लगाने में नाकाम रही हैं। हज़ारों साल पहले एक ही जड़ से निकली दो शाखाओं की तरह आर्यों के दो समूहों ने इन दोनों देशों को आबाद किया जो कि एक ही तरह की संस्कृति रखते थे। और जिनकी भाषा सभ्यता और परंपरा में बहुत ज़्यादा अंतर नहीं था।

हम पहले ही लिख चुके हैं कि ईरान ‘ईर’ शब्द का बहुवचन है और यह शब्द आर्य शब्द से निकला है जिसका अर्थ संस्कृत और अवस्ता में “पवित्र एवं स्वतंत्र” है। ईरान का पुराना नाम ईरान कीश्तर था, जो धीरे-धीरे ईरान शहर यानी आर्यों का देश हो गया।

इसी तरह भारतीय आर्यों ने अपने ईरानी भाईयों की तरह अपनी इस भूमि का नाम आर्यावर्त रखा और अपने इस नए भौगोलिक ढाँचे में ढलने लगे। भौगोलिक परिस्थितियों और वातावरण की भिन्नता ने दोनों को अलग ज़रूर किया, लेकिन आर्य बुद्धि-विचार सदियों तक न बदल सके। जरथुस्त्र की अग्निपूजा वैदिकों के यज्ञ से किसी भी प्रकार अलग न थी। जेंद ए अवेस्ता के श्लोक संस्कृत के मंत्रों से इस सीमा तक मिलते हैं कि उच्चारण के थोड़े से बदलाव से ही ईरानी और भारतीय दोनों वेदों और अवेस्ता को पढ़कर लाभ ले सकते हैं। बौद्ध-जैन धर्म की मान्यता ईरान की जनता में इस सीमा तक पहुँच चुकी थी कि तीसरी शताब्दी ईस्वी में वहाँ स्थापित होने वाले मशहूर ईरानी पैग़ंबर मानी का धर्म “मज़हब ए मानवी” अहिंसा का ही प्रचार था।

सासानी वंश के राजा अपने समय के भारतीय राजाओं से संबंध मज़बूत करने की कोशिश में लगे रहते थे। परम्परा में सुना जाता है कि सासानी राजा बहराम गोर, कन्नौज के राजा संगल से मिलने भारत आया। जहाँ उसने राजा संगल की लड़की से शादी भी की। इस रिश्ते से राजपूतों की जो शाखा निकली उसे ‘गृद्धबेल’ कहा जाता है। बहराम गोर संगीत से बहुत दिलचस्पी रखता था। कन्नौज के राजा ने अपने इस ईरानी दामाद के लिए बारह हज़ार लूरी संगीतकारों को ईरान भेजा। यह संगीतकार ईरान के जिस इलाक़े में जाकर बसे उसे लूरिस्तान कहा जाता है।

मशहूर ईरानी बादशाह नौशेरवा आदिल ने अपनी लड़की की शादी राजपूत राजा बापादल से की। इसी बादशाह के ज़माने में भारतीय विद्वानों और ग्रन्थों का ईरान में स्वागत किया गया। इन ग्रंथो में पञ्चतन्त्र जैसी किताबें भी थीं, जो नीतिशिक्षा और ज्ञान से भरी हुई थीं। इन विद्वानों में बड़े-बड़े वैद्य और चिकित्सक भी थे। जिन्होंने अपने ज्ञान से क्रांति ला दी। हमला ए इस्लाम के दौरान पारसियों का भारत में शरण लेना भी एक अहम ऐतिहासिक घटना है। यह शरण लेने वाले पारसी समय बीतने के साथ-साथ भारतीय समाज में इस तरह घुल-मिल गए कि उन्हें अलग समझने का विचार ही नहीं आता है। आज हम भले ही उन्हें पारसी कहकर बुलाते हों लेकिन वह पारसी बनकर नहीं रहते बल्कि ख़ास भारतीयों की तरह इस देश के विकास में लगे हुये हैं।

यद्यपि भारत में इस्लाम अरबों के साथ आया लेकिन इसके प्रचार-प्रसार का ज़्यादातर ज़िम्मा ईरानियों के हाथ रहा। मुहम्मद बिन क़ासिम हमला ए मुल्तान के वक़्त दक्षिणी ईरान से बहुत से ईरानियों को अपने साथ लाया था। उन्हीं ईरानियों ने धीरे-धीरे सारे देश में फैल कर अपनी मातृभाषा फ़ारसी में इस्लाम के प्रचार में मदद दी। इसी कड़ी में दूसरी अहम बात महमूद ग़ज़नवी और उसके लोगों का भारत आना था। सियासी नज़रिये से इसकी कोई अहमियत हो या ना हो लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से यह बहुत अहम बात थी। ईरानी सेना के साथ-साथ ख़ुदापरस्त सूफ़ी-संत इसी ज़माने में खुरासान एवं मध्य एशिया से आए और इन सूफ़ी संतों ने अपने मुहब्बत का पैग़ाम पूरे देश में फैलाया। इनकी मातृभाषा फ़ारसी थी, जो कि धर्म प्रचार के सिलसिले में उनके उपदेशों से घर-घर में पहुँच गई। फ़ारसी भारत के ज्ञान-विज्ञान एवं राजकाज की भाषा बन गई। ईरान और हिंदुस्तान की जनता के इस मेल-मिलाप के साथ प्राचीनकाल की तरह मध्यकाल में भी दोनों देशों के हुक्मरानों के सम्बन्ध बेहद ख़ुशगवार रहे। एक दूसरे से पत्र व्यवहार करना, उपहार भेजना हमेशा से चला आता था। लेकिन सोलहवीं सदी में मुग़ल बादशाह हुमायूँ से ईरान के शाह तहमास्प का व्यवहार एक मशहूर ऐतिहासिक घटना है, शेरशाह से भागकर जब हुमायूँ 1544 ईस्वी में इस्फ़हान पहुँचा तो ईरानी शाह ने ना सिर्फ हुमायूँ का शानदार स्वागत किया बल्कि ईरानी फ़ौजें देकर उसे अपनी खोई हुई बादशाहत को पाने में पूरी मदद की। एक ईरानी सामंत शेख़ जाम की बेटी हमीदा बानू से हुमायूँ की शादी भी शाह तहमास्प के शासन काल की यादगार घटना है। इससे दोनों देशों को और नज़दीक आने का मौक़ा मिला। इस मेल-मिलाप का बेहतरीन नतीजा अकबर का स्वर्णकाल है। भारत और ईरान साहित्यिक भाषाई सम्बन्ध पर बहुत कुछ विस्तार से लिखा जा चुका है। फ़ारसी ग़ज़नवी और गोरी के साथ भारत में आई और थोड़े ही समय में यहाँ राजकीय धार्मिक और साहित्यिक नज़रिये से बहुत अहमियत पा गई। मंगोल हमले के वक़्त ईरान से भागे हुये शायरों, साहित्यकारों, सूफियों, विद्वानों के साथ-साथ अलग-अलग तबक़ों के लोगों ने भारत में इसे और फैलाया। और धीरे-धीरे भारत में इसे वही जगह मिल गई, जो कभी संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश को मिल चुकी थी। सोलहवीं सदी में इस भाषा की तरक़्क़ी की सब से बड़ी वज़ह मुग़लों का इसे दिया गया संरक्षण है। शायरों, साहित्यकारों, विद्वानों को बढ़ावा देने में भारतीय बादशाहों ने ऐसी दरियादिली का सुबूत दिया कि ज़्यादातर कलाकार ईरानी दरबारों को सूना करके भारत कि चौखट पर आ खड़े हुये। जिन कलाकारों को मजबूरी में लौटना पड़ा वे रोते हुये गए। सारे रास्ते उनकी आँखें मुड़-मुड़ कर पीछे की तरफ देखती रहीं।

भारतीय की कलाप्रियता ने जब बड़े-बड़े ईरानी कलाकारों को जब अपने चौखट पर सर झुकाने के मजबूर कर दिया तो फ़ारसी साहित्य ने स्थायी तौर पर यहीं अपना केंद्र बना लिया। इस केंद्र की स्थापना शेख़ अली हजी इस्फ़हानी के 1765 ईस्वी में यहीं गुज़रने तक बड़ी अहमियत रखता है। इस अहमियत का सबसे पुख़्ता सुबूत फ़ारसी साहित्य एवं काव्य में उस आंदोलन का उठना है जिसे ईरान में "सब्क ए हिन्दी"(Indian Style)का नाम देते हैं। शीराज़ी आमली, काशानी, तबरीजी और इस्फ़हानी शायर भारत आए और "सब्क ए हिन्दी" को अपना कर काव्य की झड़ी लगा दी। इनमें से बहुत इसी मिट्टी के पैबंद हो गए और जो ईरान लौटे उन्होंने इस तरीक़े को सारे ईरान में फैला दिया। आज भी सादी और हाफ़िज़ के बाद वहाँ सब्क ए हिन्दी की प्रसिद्धि सबसे ज़्यादा है। भारतीय संस्कृति की एक गहरी छाप जो अब तक ईरानियों के दिलो-दिमाग़ और ख़याल में मौजूद है, वह है वैराग्य, दर्शन एवं परमसत्य का प्रचार। यह भारतीय वेदान्त, भक्ति, उपनिषदों का संदेश ही था जिसने सूफ़ीयाना दर्शन के फलने फूलने में मदद दी जो बाद में तसव्वुफ़ के नाम से मशहूर हुआ। इसी साधना के कारण ईरानी सूफियों और भारतीय साधु संतों में बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है। बौद्ध धर्म के मानने वालों के लिए वह ज़माना भी एक सुनहरी यादगार है, जब पुरुषपुर यानी पेशावर के बौद्ध भिक्षु ईरान होते हुये दमिश्क़ (सीरिया) जा पहुँचे। ये भिक्षु धर्म के अलावा भारत की कला-संस्कृति के तमाम पहलुओं पर रोशनी डालते थे। प्राचीन ईरानी घाटी बमियान में बौद्धविहार और महात्मा बुद्ध की विशालकाय मूर्तियाँ प्राचीन ईरान में भारतीय धर्म की मौजूदगी के साथ-साथ गांधार कला के विकास का भी सुबूत हैं। फ़ारसी भाषा का ‘बुत’ शब्द बुद्ध से निकला है, और यह इसी ज़माने की देन है। यद्यपि आज ईरानी ज़िंदगी के हर पहलू पर पश्चिमी संस्कृति पर की छाप बहुत गहरी दिखाई देती है। लेकिन हक़ीक़त यह है, कि भारतीय पर्यटक बहुत देर तक ईरान के माहौल में अजनबीपैन महसूस नहीं करता है। पश्चिमी संस्कृति का असर भले ही रहन सहन पर हो लेकिन ख़याल, रीति-रिवाज और तहज़ीब के मामले में ईरानी आज भी उसी आर्यों की सभ्यता का हिमायत करता दिखाई देता है जो दोनों देशों में एक सी है। पश्चिमी कपड़ों और तौर तरीक़ों को चाहने वाले बड़ी तादाद में मिलते हैं लेकिन बड़े-बुज़ुर्गों के सामने परंपरागत कपड़े ही सम्मान की पहचान हैं और दिल की बात अपनी भाषा में कही सुनी जाती है। अगर दस्तरख्वान पर बैठिए तो चिलो व पोलाव, बिरयानी, कोफ़्ता, कबाब की मौजूदगी से यूं महसूस होता है कि आप तेहरान में नहीं बल्कि दिल्ली के मोतीमहल होटल में हो। यहाँ मेहमाननवाज़ी के मज़बूत रिवाज को क़ायम रखते हुये आप से बार बार खाने का आग्रह किया जा रहा है कि हर चीज़ को ज़्यादा से ज़्यादा खाएँ। मेज़बान और उसके दोस्त भारतीय अंदाज़ में अपने हिस्से के खाने में से अच्छी-अच्छी चीज़ें निकालकर आप को बार-बार पेश करते हैं जिससे मेहमान कि ख़िदमत में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया जा सके। घर के मालिक और साथियों के नाम इतने जाने पहचाने हैं कि भारतीय मेहमान अपने को दिल्ली या लखनऊ के किसी घर में लोगो से घिरा हुआ महसूस करता है। अहमद, हसन, नाहीद, नसरीन, यास्मीन, फ़ातिमा वग़ैरा सभी भारतीय नाम ही तो हैं। इसके अलावा सैकड़ों शब्द ऐसे सुनाई पड़ते हैं जैसे वो हिन्दी के हों।

हम भारतीयों की तरह ईरानियों को भी संगीत से बहुत दिलचस्पी है। घरों बाज़ारों होटलों रेस्त्रा हर जगह संगीत अपनी मौजूदगी का एहसास कराती रहती है। ईरानी संगीत की आम धुनें कुछ इस अंदाज़ में पेश की जाती है कि एक भारतीय संगीतकार को फ़ौरन अपने संगीत का वह रूप याद आ जाता है जिसे संगीत की परिभाषा में राग भैरवी कहा जाता है। ईरान में भारतीय बालीवुड की चाहत बहुत ज़्यादा है। भारतीय एक्टरों के यह लोग इस हद तक दीवानें हैं कि तेहरान कि गलियों सड़कों में अक्सर नरगिस ए राजकपूर की आवाज़ें सुनाई देती हैं पूछने पर मालूम होगा कि कोई लड़का नरगिस के फूल बेच रहा है, और उन फूलों को नरगिसे राजकपूर कहकर अपने ग्राहकों को लुभाने की कोशिश कर रहा है। बालीवुड की फिल्में गाने डायलाग फ़ारसी में डब कर लिए जाते हैं। इस तरह गली कूँचों में भारतीय धुने गूँजती रहती हैं। फिल्मों के जरिये ही हमारे रस्मों रिवाज तौर तरीक़े और पहनावें ईरान में पहुँच रहे हैं। भारतीय कपड़े यानी साड़ी और नाच गाने ज़्यादातर हिन्दी फिल्मों से ही जा रहे हैं।

ईरान की शासन प्रणाली भले ही हमसे अलग है लेकिन ज़्यादातर समाज हमारे लोकतन्त्र को सम्मान से देखता है। बुद्दिजीवियों में दुनियाँ के बेहतरीन कवियों के मुक़ाबले में रवीन्द्रनाथ टैगोर को तरजीह दी जाती है। ईरानी शोधकर्ता अरबी के साथ साथ संस्कृत की शिक्षा को भी ज़रूरी समझता है। भाषाई शोध के बारे में गुमशुदा कड़ियों का पता लगाने के लिए अरबी की तरह संस्कृत की भी ज़रूरत पड़ती है। इसी लिए तेहरान विश्वविद्यालय में संस्कृत का एक स्थायी विभाग भी खोला गया है, जिसकी अध्यक्षता किसी वरिष्ठ भारतीय विद्वान को ही दी जाती है।

परिशिष्ट-

मानी धर्म-

यह ईरान में सासानी दौर में प्रचलित एक धर्म था। इसे फारसी में ‘आईने मानी’ या मज़हब ए मानी’ कहा जाता है। अँग्रेजी में इसके लिए Mainchaism शब्द प्रचलित है। इस धर्म की स्थापना मानी नाम के ईरानी महापुरुष ने की थी। इस धर्म मे बौद्ध ईसाई और पारसी धर्म के बहुत से तत्त्वों का सम्मिश्रण था। यह धर्म तीसरी से सातवी सदी तक प्रचलित था। मानी ने छह पुस्तके लिखी जिनमें छह सीरियाई में और एक मध्यकालीन फ़ारसी में थी।

क़ाजार वंश-

यह एक तुर्की नस्ल का राजघराना था जिसने 1785-1925 ईस्वी तक ईरान पर राज्य किया।

मारूफ़ और महजूल-

यह फ़ारसी के यीये अक्षर की दो किस्में हैं। जो ईरान में अब एक ही इस्तेमाल होती है लेकिन भारत में दोनों इस्तेमाल की जाती है।

बहज़ाद-

यह ईरान का प्रसिद्ध चित्रकार था। इसका नाम कमालुद्दीन था बहज़ाद इसका उपनाम था। यह हेरात का रहने वाला था। इसके गुरु पीर सय्यद अहमद तबरेज़ी थे। यह तैमूरी काल से सफ़वी के मध्य का था। शाह इस्माइल सफ़वी ने इसे हेरात से तबरेज़ अपने दरबार में बुलाया।

रज़ा अब्बासी–

यह भी ईरान के बादशाह शाह अब्बास प्रथम के दरबार का चित्रकार था।

आतिशपरस्त –

यह ईरान के प्रसिद्ध धर्म पारसी जिसे वहाँ जरतुश्त भी कहा जाता हैं का उप संप्रदाय है। आतिशपरस्त का मतलब अग्निपूजक है। इसके और उपसंप्रदायों में मेहेरपरस्त (सूर्यपूजक) भी है।

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- क्रमश


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