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ISSN 2292-9754

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04.26.2016


आँखों देखा ईरान
मूल लेखक: प्रो. अमृतलाल “इशरत”
अनुवादक: राजेश सरकार

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नवीन गद्य-

फारसी गद्य के विकास में तीन चीज़ों की शुरुआत काफ़ी महत्त्व रखती है। पहला सफ़रनामों (यात्रा वृत्तान्त) की रचना और सम्पादन। दूसरा छापाख़ाने का आविष्कार। तीसरा पश्चिमी देशों के साहित्य का अनुवाद। नए लिखने वालों के सामने काफ़ी बड़ा मक़सद था। उन्हें कानून और लोकतन्त्र की आवाज़ दूर-दूर तक पहुँचाने के लिए एक ऐसी भाषा की ज़रूरत थी, जो आम और ख़ास दोनों के लिए असरदार हो। 1909 की क्रान्ति के पहले जो उपन्यास लिखे गए उस में ईरान के सामाजिक वातावरण की ख़राबियों को आलोचनात्मक रूप से उजागर किया गया है। इसमें सुधारवादी नज़रिया साफ़ तौर पर दिखता है। जैनुल आब्दीन का सियाहतनामा इब्राहीम बेग, मिर्ज़ा मालकम खान की दोनों रचनाएँ-अशरफ़ ख़ान व ज़मान ख़ान। तालबूफ़ की रचना ‘किताब अहमद’ इसी तरह के उपन्यास हैं। यही विषय मशफ़क़ काज़मी की रचना में पूरी तरह अपनाई गई है। ‘तेहरान मकूफ़’ इनका मशहूर उपन्यास है, जो तीन भागों में है, और सीधी-साधी भाषा में लिखा गया है। उपन्यास में लेखक ने सरकार और हुकूमत की बुराइयों को बेनक़ाब किया है। लेखक के ख़याल में एक ज़बरदस्त क्रांति ही जनता के दुख दर्द दूर कर सकती है। मशरूतीयत आंदोलन (constitutional reform movement) के कुछ पहले ईरान में पश्चिम और पश्चिमी शैली के प्रभाव में बहुत से ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे गए। पहले उपन्यास में मीर्ज़ा मुहम्मद बाक़िर का ‘शम्स तुगरा’ क़ाबिल ए ज़िक्र है। तीन जिल्दों के इस उपन्यास में मंगोल हमले के समय के शीराज़ शहर का वर्णन है।

शरीफ़ के नावेल “ख़ून बहाई ईरान” में प्रथम विश्वयुद्ध के हालात का बयान है। इसी सिलसिले मेँ उपन्यास ‘इश्क़ व सल्तनत’ बहुत मशहूर रहा। शेख़ मूसा हमदानी के इस उपन्यास मेँ छठी शताब्दी के विश्वप्रसिद्ध ईरानी बादशाह कुरुष महान के ज़माने को प्रस्तुत किया गया है। इसी तरह एक मशहूर सुधारवादी साहित्यकार जमाल ज़ादा हैं, जो फ़ारसी साहित्य मेँ तरह-तरह की  कहानियों के रचनाकार हैं। इनकी कहानियों का पहला संग्रह ‘यकी बूद यकी नबूद’1920 ई. में बर्लिन से प्रकाशित हुई। इसमें कुल सात कहानियाँ हैं। इन कहानीकारों में सादिक़ हिदायत मसूद देहाती का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। मसूद की रचनाएँ- “तफ़रीहात ए शब” (रातों की सैर) में बड़े और दौलतमन्द घरों के जवान लड़कों की उन मौज-मस्ती का जायज़ा लिया गया है, जो सूरज के डूबने के बाद और सूरज निकलने के पहले होती है। उनके उपन्यास ‘दर तलाश मास’ में बेरोज़गारी और बेकारी की तस्वीर मौजूद है।

साजिद हिदायत मौजूदा दौर का सबसे बड़ा अफ़सानानिगार (कहानीकार) है। इनकी कहानियों में- ज़िन्दा बगूर सह क़तरा ख़ून, साया रोशन, इस्फ़हान नस्फ़ ए जहान, सग वल्द गिर्द या गर्द, बूफ़ कूफ़ वग़ैरा। उपन्यास और कहानी के अलावा दूसरी तरह की रचनाओं पर भी ध्यान दिया गया है। इन रचनाओं की शुरुआत अल्लामा अब्दुल्लाह वहाब करबीनी ने किया और उसके बाद के लोगों ने उनकी नक़ल की। इन लोगों में सैयद जलालुद्दीन काशानी, मीर्ज़ा जहाँगीर ख़ान शीराज़ी मीर्ज़ा मुहम्मद हुसैन फ़रोगी, बहार, अल्लामा दहख़ुदा के नाम ख़ास तौर पर मशहूर हैं। शब्दकोश (Dictionary) लिखने वालों में उस दौर में लिखी गई “लुग़तनामा ए दहख़ुदा” बहुत ही मशहूर हुई। इसकी सौ से ज़्यादा जिल्दें प्रकाशित हो चुकी हैं। फ़ारसी साहित्य का इतिहास लिखने वालों में जलाल हयाली, डॉ. रज़ा ज़ादा शफ़क़, डॉ. मुहम्मद मुईन, डॉ. ज़बीहुल्लाह शफ़ा, डॉ. परवेज़ ख़ानलरी, वगैरा। इसके अलावा बहुत से साहित्यकार ऐसे हैं, जिन्होंने हर तरह की रचनाएँ लिखी हैं। इनमें सैयद अहमद कर्बी, सैयद अब्दुल रहीम ख़लख़ाली, डॉ. मुहम्मद मक़दम, डॉ. सादिक़किया दुख़तर मुज़्तबा मीनबी, अब्बास इक़बाल, हुस्न तक़ी ज़ादा अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि वाले हैं।

नई शायरी-

नई फ़ारसी शायरी काफ़ी हद तक पश्चिम के प्रभाव और सियासी जागरूकता से जुड़ी हुई है। तेज़ी से बदलते हुये राजनीतिक, सामाजिक माहौल से नए तजुर्बे ज़रूरी थे। इन तजुर्बों ने साहित्यकारों को दो भागों में बाँट दिया। एक गुट आधुनिकता के साथ साथ परंपरा का भी पक्षधर था। तो वहीं दूसरा गुट परम्परा को बुरा समझता था। नई शायरी देशभक्ति की भावना से भरी हुई थी। नए दौर का शायर इस सांस्कृतिक देश को तरक़्क़ी करते हुये क्रान्ति की राहों में देखना चाहता था। मजदूरों किसानों के लिए हमदर्दी और हिमायत। मुनाफ़ाखोरों, जमाखोरों, ज़मीदारों के खिलाफ़ गुस्सा। औरतों के लिए पूरी आज़ादी, देश की तरक़्क़ी के लिए बराबरी। ये सब जज़्बात आम हैं। नई शायरी में इश्क़ का ख़याल हाफ़िज़ शीराज़ी और सादी के इश्क़ से जुदा है। रूहानी इश्क़ के बजाय जिस्मानी इश्क़ दिखाई देता है। माशूक़ इसी दुनिया का होता है जिस्मानी मुहब्बत ज़रूरी समझा जाता है। दो प्यासी रूहों का जिस्मानी मिलन एक क़ुदरती बात है। इस बात को तिलिस्मी व रूहानी बनाना हक़ीक़त को छिपाना हैं। मर्दो की तरह औरत को भी अधिकार है, कि वह अपने जज़्बातों व ख़यालातों का इजहार पूरी आज़ादी से करे। औरत कि ज़बान से इश्क़ व मुहब्बत का खुला इजहार नई शायरी की ऐसी खासियत है जिसकी मिसाल पुरानी शायरी में नहीं मिलती है। नई फ़ारसी ग़ज़ल पर पुरानी साहित्यिक परम्पराओं का असर ज़्यादा गहरा है। लेकिन फिर भी आज के शायरों ने पुराने रूपकों को नए नए लक्षण देकर एक नया रूप दे दिया है। इधर कुछ सालों से आज़ाद शायरी का बहुत रिवाज हो चला है। इस क़िस्म के शायरों में छोटे छोटे मिसरो की मदद से पूरा असर पैदा करने की कोशिश की जाती है। अक्सर इस क़िस्म की शायरी सीधी सपाट गद्य मालूम होती है। छंदों का भी ख़याल नहीं रखा जाता है। इस क़िस्म की शायरी पढ़े लिखो में ज़्यादा पसंद की जाती है। नई शायरी में ज़बान व बयान की सादगी की तरफ़ ख़ास ध्यान दिया गया है। आम तौर पर अरबी के भारी भरकम शब्दों से परहेज़ किया जाता है। नई शायरी में बोलचाल की ज़बान को बड़ी ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया जा रहा है। तेहरानी लहजे को इस शायरी में ख़ास अहमियत हासिल है। आज दौर के शायरों में कुछ नाम ख़ास तौर पर क़ाबिले ज़िक्र है मलिकुश्शोंअरा मुहम्मद तक़ी बहार(1822-1951) ईरान के देशभक्त शायरों में से थे। उन्होंने अपनी देशभक्ति की कविताओं और शायरी से बहुत जल्द ही अपने देश ईरान में प्रसिद्धि पा ली। बहार के ख़याल में नए विचारों की अभिव्यक्ति के लिए पुरानी कसौटी नए की अपेक्षा अधिक कारगार है। उनकी संस्था “अदबी अंजुमन ए दानिशकदा”उन्ही के विचारों को प्रोत्साहन देने के लिए क़ायम किया गया। बहार आधुनिक काल के सबसे बड़े शायर ख़याल किए जाते हैं। शब्दो के मामले में उन्होंने नए एवं पुराने शब्दो का इतना बढ़िया इस्तमाल किया है कि कविता कि अर्थवत्ता बढ़ गई है। साहित्यिक कामों के साथ-साथ वह सियासी कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। यही वज़ह रही कि कभी तो वह देश के शिक्षामंत्री तक बनाए गए और कभी जेल की सलाखों के पीछे भी रहना पड़ा। वह एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी हैं। ‘जुग़द जंग’ उनकी बेहतरीन रचनाओं में से है। जंग की बर्बादियों के साथ-साथ वह इसमें सामंतों, ज़मीदारों, पश्चिमी देशों के लीडरों के क़त्लो ग़ारतका बेबाक ख़ाका खींचते हैं।

अबुल क़ासिम लाहूती(1887-1957)

नए ईरान के विद्रोही शायरों में एक थे। हुकूमत के खिलाफ़ बग़ावत फैलाने के जुर्म में उन्हें कई बार गिरफ्तार करने की कोशिश की गई। इनकी मौत देश से निर्वासन की हालत में रशिया में हुआ। लाहूती वामपंथी खयालात रखते थे। मजदूरो के एहसासों की अभिव्यक्ति में उन्हें बहुत सुख मिलता था। उनकी कविता सादगी और मिठास में बेजोड़ और असर मुकम्मल है। मास्को के शाही केन्द्र क्रेमलिन को देखकर उनके दिल में उमडी हुई बगावत एक कविता के रूप में आई। जिसका शीर्षक उन्होंने’क्रेमलिन’रखा। क्रेमलिन की एक-एक चीज़ उन्हें मज़दूर और दबे कुचले वर्ग की परेशानियों की याद दिलाता है। लाहूती ने रशिया के ज़ारशाही की ऐयाशी पर क़ुर्बान होती हुई जनता की हालत बड़ी बेबाकी से खीचते हैं।

अबुल क़ासिम आरिफ़(1882-1932)

ये ग़ज़ल कहने वाले शायर थे। उन्होंने ग़ज़ल को केवल हुस्न व इश्क़ तक ही सीमित नहीं किया। उनकी ग़ज़लें अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक कश्मकश की गवाह हैं। वह क़ौम और वतन के लिए बहुत कुछ क़ुर्बान कर चुके थे। लेकिन उनका ज़्यादातर समय दुख में गुज़रा। यह क्रान्तिकारी व्यक्तित्व के थे। ये अपनी ग़ज़लों में सामाजिक एवं राजनीतिक हालातों को पुरअसर अंदाज़ में पेश करते थे। लोग उनके गीतों को आंदोलन के वक्त समूहो में गाते थे। उनके ये गीत तसानीफ़ महली कहे जाते हैं, आम खास सभी में मशहूर है। मशरूतीयत आंदोलन(constitution reform movement) के दोबारा होने पर उनकी यह रचना हर जगह गाई जाती थी।

नीमा यूशीच

नए ईरान के आधुनिकतावादी शायरों में से हैं। इनकी क्रान्तिप्रियता ने शायरों की एक पूरी नस्ल को प्रभावित किया। शेरगोई(शेर कहने)में तक़लीदपरस्ती(अनुकरण) के खिलाफ़ साहित्यिक क्रान्ति छेड़कर आज़ाद और छंदोमुक्त कविताओं को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की। फ़ारसी साहित्य में शायरी का प्रारूप और शैली बदलने के लिए नीमा यूशीच ने अपनी पूरी क्षमता खर्च की, और प्रायः सफल भी रहे हैं। ख़ानवादा, सरबाज़, मजलिस, अफ़साना अई शब, क़िस्सा ए रंग, परीदा वग़ैरा उनकी प्रसिद्ध ग़ज़लें हैं। ग़ज़लों शेरों में नए-नए प्रयोगो की वज़ह से कई परंपरावादी शायर उनका विरोध भी करते रहे हैं लेकिन अपने इन्ही नए प्रयोगों की वज़ह से वह छाए भी रहे।

नादिर नादिरपुरी

नादिर नादिरपुरी की शायरी आधुनिकयुग के एक हारे हुये इंसान की फ़रियाद है। उनकी रचना में ज़िन्दगी के दर्दों ग़म पूरी तेज़ी से झाँकते नज़र आते हैं। शायर की निजी तकलीफ़ और नाकामियाँ जब शेर में ढलती है, तो पढ़ने वाले को अपने दुख-दर्द याद आ जाते हैं। शायर का दिल ग़म की पहचान करने में क़ाबिलियत रखता है। और वह ग़म से दूर रहने की बजाए ग़म की परश्तिस करता नज़र आता है। “शेर ए ख़ुदा” नाम की कविता में इश्क़, क़मार, ज़न, वग़ैरा। संगीत और शराब को शैतान का के शेर कहा गया है और ख़ुदा को सिर्फ़ एक शेर का बनाने वाला कहा गया है और वह है ग़म। इसी तरह फ़रीदून तवल्लुली, मुहम्मद हुसैन शहरयार, रही मोअर्ररी नए ईरान के मशहूर शायर हैं।

परवीन ऐतसामी

परवीन ऐतसामी आधुनिक फ़ारसी साहित्य में एक विख्यात महिला नाम है। इनका जन्म 16 मार्च 1907 ईस्वी को ईरान के तबरीज़ शहर में हुआ था। इनका परिवार बहुत पहले ही तेहरान में आ बसा। परवीन ने अरबी और फ़ारसी की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता मिर्ज़ा यूसुफ़ ऐतसामी से प्राप्त की। 1926 ईस्वी में परवीन को पहलवी राजवंश जो कि ईरान का शासक था, की रानी के शिक्षकपद का आमंत्रण मिला, जिसे इनके द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। शादी के बाद वह किरमानशाह जा बसी। लेकिन यह शादी केवल और केवल दस सप्ताह तक ही रहा और वह वापस तेहरान लौट आई। परवीन का निधन 5 अप्रैल1941 ईस्वी को पैतिस साल की अल्प आयु में ही हो गया। परवीन को उनके पिता की क़ब्र के पास पवित्र शहर क़ुम में दफ्न कर दिया गया।

परवीन की प्रतिभा सात या आठ वर्ष की आयु से ही प्रकट होने लगी। 1921 ईस्वी में उनकी कुछ शुरुआती कवितायें फ़ारसी मैगज़ीन बहार में प्रकाशित हुई। उनके दीवान का पहला संस्करण 156 कविताओं के साथ 1935 ईस्वी में प्रकाशित हुआ। परवीन की पुस्तक का दूसरा संस्करण उनके भाई अबुल फ़ातहा ऐतसामी ने संपादित किया जो उनकी मौत के बाद 1941 ईस्वी में प्रकाशित हुआ। इनकी कुछ कवितायेँ ज़न दर ईरान(ईरान में औरत) अइ रंजबर(ऐ मजदूरों), गुरबेह(बिल्ली), सफ़र ए अश्क(अश्रु यात्रा) है। फ़ारसी काव्य की एक विधा मोनाज़रा(Debate)भी बड़ी मात्रा में परवीन के दीवान में मिलते हैं। इस विधा में 65 रचनाए 75 लघुकथाएँ एवं पशुकथा शोकगीत विविध तरह की रचना की है। परवीन की रचनाएँ विशेष रूप सामाजिक न्याय, अधिकार नीति शिक्षा एवं ज्ञान के महत्त्व पर आधारित है।

फ़रुग़ फर्रूख़ज़ाद

इनका जन्म 1935 ईस्वी में तेहरान में हुआ था। इनकी प्राथमिक शिक्षा बहुत से वजहों से अधूरी रही। सोलह साल की उम्र से ही वह पुराने शायरों की तर्ज़ पर ग़ज़लें लिखने लगीं।

इनका सामाजिक जीवन नियम क़ानूनों से आज़ाद था। इनका वैवाहिक जीवन और संबंध एक जगह टिके न रह सके। अपने बेटे की मौत और बार बार होने वाले तलाक़ ने इन्हें गहरे अवसाद में धकेल दिया। साहित्यकार होने के साथ-साथ वह फिल्मकार भी थी। इस सिलसिले में इन्हें ब्रिटेन इटली जैसे देशों की यात्रा भी करनी पड़ी। ईरान की इस विवादास्पद कवयित्री का का जीवन बड़ा ही उथल पुथल भरा रहा। इस उतार-चढ़ाव के साथ उनका जीवन नौ वर्षों तक उनके अंतरंग पुरुषमित्र के साथ बीता। 1967 ईस्वी इन्ही विसंगतियों का सामना करते हुये फरवरी के महीने में मात्र 32 साल की उम्र में एक कार दुर्घटना में इनकी मृत्यु हो गई। इनका पहला काव्यसंग्रह असीर(क़ैद)नाम से एवं दूसरा दीवार नाम से प्रकाशित हुआ। इनकी रचना इसियान(विद्रोह) एवं तवल्लुद ए दीगर(पुनर्जन्म)भी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं। साहित्य के साथ-साथ ये फिल्मों मे भी जाना पहचाना नाम रही हैं। 1959 ईस्वी में इन्होंने A Fire नाम की फिल्म का सम्पादन किया। courtship नामक फिल्म में भूमिका निभाई और सहयोग किया। यह फिल्म ईरानी समाज के विवाहपूर्व सम्बन्धों पर आधारित है। इन्होंने ईरान के प्रसिद्ध समाचारपत्र KAHAYAN के लिए बनी फिल्म Water and Heat में सहनिर्देशन का काम किया। इन्होंने एक अंतहीन फिल्म The Sea में भी काम किया। इसकी पटकथा इनके पुरुष मित्र की लघुकथा Why did the sea become stormy? पर आधारित थी। कुष्ठ रोगियों की दशा पर बनी फिल्म House Of Black के लिए जर्मनी में आयोजित फिल्म समारोह में Grand Prize मिला। इनके शेरो का पहला संग्रह 1964 ईस्वी मे प्रकाशित हुआ। मौत के बाद भी इनका एक काव्य संग्रह 1974 में प्रकाशित हुआ।

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- क्रमश


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