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ISSN 2292-9754

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04.26.2016


आँखों देखा ईरान
मूल लेखक: प्रो. अमृतलाल “इशरत”
अनुवादक: राजेश सरकार

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राजतन्त्र होने के बावजूद ईरानी जनता के शिक्षित वर्ग में लोकतान्त्रिक विचारों की मौजूदगी किसी अजनबी के लिए बड़ी दिलचस्प मालूम होती है। पहली बार यह बात एक अंतर्विरोध मालूम होती है। लेकिन अगर वह ग़ौर से देखेगा तो हक़ीक़त उसके सामने आ जाएगी। शाह रज़ा पहलवी एक आज़ाद ख़याल और सुधारवादी व्यक्ति है। इसे ईरानी जनता की ख़ुशहाली और समृद्धि इसलिए भी पसंद है, कि वह अपने देश ईरान को विकसित देशों की क़तार में देखना चाहता है। लेकिन इनमें दोनों ओर से कुछ सीमाएँ बँधी हुई हैं। जिसकी वज़ह से न तो ईरान की जनता हमेशा के लिए संतुष्ट हो सकती है, और न ही शाह। इसी लिए रज़ा शाह यदि किसी एक देश का साथ देना चाहता है, तो शिक्षित वर्ग लोकतान्त्रिक दृष्टि से शाह के पक्ष की तरफ़दारी करता हुआ नज़र आता है। ईरान के समाज में “तबक़ा ए मालिकीन” सबसे ज़्यादा अहमियत रखता है। यह लोग बड़े-बड़े जागीरदार और ज़मीदार हैं। इनकी संख्या देश भर में डेढ़ दो सौ परिवारों से ज़्यादा नहीं होगी, शायद देश की पैदावार का आधे से ज़्यादा हिस्सा इन्हीं की जेब में जाता होगा। जनता उन्हें अयान, अशराफ़, रिज़ाल और गरदन ए गुलफ़्त वग़ैरा नामों से पुकारती है। यह लोग ख़ुद तो बड़े-बड़े शहरों में रहते है। लेकिन उनके कारिंदे जागीरों ज़मीनों पर नियुक्त होते हैं, और खेत खलिहानों की आमदनी उनके खज़ानों तक पहुँचाते रहते हैं। कभी-कभी ज़मीनों के साथ-साथ किसानों की भी अदला-बदली होती है, बिलकुल वैसे ही जैसे मवेशी, खेत-खलिहान।

दूसरा वर्ग व्यापारियों का है। यह लोग भी बहुत दौलतमंद और पूँजीपति हैं। इनमें बड़े-बड़े ज़मीदार भी शामिल हैं। उन लोगों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक संबंध उनमें उदार विचारों की वज़ह बनते हैं। कभी-कभी यह लोग मुल्लाओं के समर्थन में हो जाते हैं, तो देश के शासन में बहुत पहुँच बना लेते हैं।

मुल्लाओं और उलमा वर्ग कभी-कभार देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों के फ़ैसलों में बहुत प्रभावशाली दिखाई देता है। सरकार की ओर से लगे प्रतिबन्धों के कारण पहले से उनकी माली हालत ख़स्ताहाल हो चुकी है। वक़्फ़ (धार्मिक आय) का ज़्यादातर हिस्सा अब सरकार को चला जाता है।

धर्म एवं सम्प्रदाय

ईरान के अट्ठानबे फ़ीसदी लोग इस्लाम के मानने वाले हैं। उसमें लगभग चौरानबे फ़ीसद लोग शिया और चार फ़ीसद लोग सुन्नी हैं। आख़िर में ज़िक्र किए जाने वाले लोगों में कुर्द हैं। कुर्द में शिया और सुन्नी दोनों हैं। लगभग पचास हज़ार आर्मेनियन ईरान के अलग-अलग हिस्सों में बस गए हैं। यह लोग नसतूरी ईसाई हैं। कैथोलिक और प्रोटोस्टेण्ट ईसाई भी मिलते हैं लेकिन इनकी तादाद बहुत कम है। यज़्द और किरमान अब भी आतिशपरस्त (अग्निपूजक) और ज़रतुशतियों (पारसी धर्म) के केंद्र हैं। लेकिन इनकी भी तादाद बहुत ज़्यादा नहीं है। तेहरान इस्फ़हान, शीराज़ में ज़रतुशती (पारसी) बाग़वानी और व्यापार के कामों में लगे हुये दिखाई देते हैं। शियामत को सरकारी संरक्षण प्राप्त है, और संविधान के अनुसार शियामत ही राजधर्म है। लेकिन दूसरे धर्म-सम्प्रदाय के सम्मान का भी ध्यान रखा जाता है। ज़ाहिदान, तेहरान और दूसरे शहरों में हिन्दुस्तानी गुरुद्वारों के क़ायम करने की पूरी आज़ादी है। ज़ाहिदान का पुराना नाम दुज़दाब था। हिन्दुस्तानी लोगों के ज़ुहद (संघर्ष) इबादत (प्रार्थना) और गुरुद्वारों के क़ायम करने की वज़ह से इस शहर का नाम ज़ाहिदान रख दिया है। तेहरान के ‘ख़याबाने बर्क’ नाम की जगह पर एक अच्छी ख़ासी तादाद सिख व्यापारियों की है, जिन्होंने आपसी मदद से एक शानदार गुरुद्वारा बनाया है। यहाँ बिना किसी भेदभाव के यात्रियों के लिए ठहरने का बढ़िया इंतज़ाम है। भारतीय आध्यात्मिक विचारों के प्रचार के लिए ऐसे पूजास्थल का क़ायम होना काफी लाभकारी हुआ है।

फ़ुनून ए लतीफ़ा (Fine Arts) -

ईरानी हमेशा से हुस्नपरस्त होते आए हैं। बाग़, बग़ीचों, हरियाली, झरनों, नहरों से इस क़ौम को बहुत ज़्यादा इश्क़ रहा है। गुलो-बुलबुल की कहानियाँ और शम्मा-परवाने के हुस्नो-इश्क़ की दास्तानें सदियों से उनकी ज़बान पर हैं। फ़स्ल ए बहार (बसंत ऋतु) की रंगीनियाँ जिस अंदाज़ और जोश ओ ख़रोश से ईरानी बयान करता है, शायद ही इसकी मिसाल कहीं और मिल सके इसी हुस्नपरस्ती और ख़ूबसूरती की चाहत में वह अपने देश को “किश्वर ए गुल ओ बुलबुल” यानी बाग़ और बुलबुल का देश कहता है। दूसरे देशों के मुक़ाबले में इसे “ईरान जन्नतुननिशा” यानी ईरान स्वर्गभूमि कहता है। यही हुस्नपरस्ती का जज़्बा है जो ईरान के फाइन आर्ट्स में भी बड़ी गहराई से दिखती हैं। और यहाँ की कलाओं और घरेलू चीज़ों को एक अलग ही अंदाज़ देती हैं। ग़ौर से देखने पर मालूम होगा कि यह जज़्बा सदियों से ईरान की सामाजिक रीति रिवाज और परम्पराओं में शामिल रही है। तेरहवीं सदी में एक मशहूर ईरानी सूफ़ी संत शेख महमूद शबिसतरी ने हुस्न को अल्लाह की ज़ात (स्वरूप) से जोड़ा है। ईरानी कलाकारों ने ने इसी नज़रिये को अपना विश्वास बनाया। ईरानी कलाकारों और फ़नकारों का फ़न अपने गर्दो-पेश के माहौल में गहराई से शामिल रहा है। ज़िंदगी को खुशी से गुज़ारने का ख़याल उसे ख़ूबसूरतियों की ओर खींचते हैं। हाफ़िज़ शीराज़ी और उमर ख़ैयाम उसे धार्मिक उदारता का रास्ता दिखाते हैं। फ़िरदौसी से वह शाही ठाठ बाट, तिलिस्म के अलावा देशभक्ति का भी का पाठ पढ़ता है। इन सबसे बढ़कर उसके ज़हन में अहुरमज़्दा की वह प्रकाशमय आस्था भी मौजूद है जो उसे बुराई और अंधकार से दूर रहने की शिक्षा देती है। पैदाइश ए हुस्न कोई आसान काम नहीं है। ईरानी अपना पूरा दिमाग़ और नाज़ुककारी इसी सोच में खर्च करता है हमेशा बेहतर से बेहतर की तलाश में रहता है। यही वज़ह है कि जब उसके सामने हुस्न को शक्ल देकर खड़ा किया जाता है तो उसके मुँह से सिर्फ़ यही निकलता है –“बद नीस्त” यानी बुरा नहीं है। इससे भी बेहतर के तलाश में खो जाएगा। यह रिवाज़ शुरू से चला आ रहा है। और ईरानी शिल्पकला (फाइन आर्ट्स) की बुनियाद की सोच भी यही है। इस्फ़हान के कलाकार लकड़ी के डिब्बों, औरतों के ज़ेवर रखने डिब्बों, सिगरेटकेस पर अलग-अलग रंगों के इस्तमाल से मौसम ए बहार (बसंतऋतु), इस्फ़हान की इमारतों, उमर ख़ैयाम के साक़ी और पुलों वग़ैरा की तस्वीरें जब बनाते हैं, तो सदियों से दबी हुई कला की आत्मा यह कहती हुई महसूस होती है, कि इससे पहले मैंने ख़ुद भी अपने रूप पर यह निखार नहीं देखा था। रज़ाकारी ख़ातिमकारी और नाज़ुककारी के नाम से यह रिवायत ईरानी कलाकारों का दबदबा क़ायम किए हुये है।

क़ालीन और ग़लीचे पर ईरानी फिदा हैं। शहरों, होटलों, दफ़्तरों, घरों में हर जगह तरह-तरह की क़ालीन आँखों को सुकून देती दिखाई देते हैं। क़ालीनों के नाम उन शहरों एवं उन क़स्बों से जुड़े हुये हैं, जहाँ वह बनाए जाते हैं। काशानी, इस्फ़हानी, शीराज़ी वग़ैरा। हर शहर के अलग अलग रंग और स्टाइल हैं जिस वज़ह से उन्हें पहचानना मुश्किल नहीं है। अराक शहर में एक बहुत बड़ा सेंटर बनाया गया हैं। जहाँ तरह-तरह की क़ालीन जमा होते हैं और वहाँ से उन्हें यूरोप भेजा जाता है। इन कारखानों में बहुत से आदमी काम करते हैं। सबसे पहले काग़ज़ पर इस का नमूना और तस्वीर वग़ैरा तैयार किया जाता है। इसके बाद आठ दस आदमी मिलकर करघे पर काम करते हैं। एक निरीक्षक रंग और गाँठ बनाने की हिदायत करता रहता है। क़ालीबाफ़ी, यानी क़ालीन बुनने की कला बहुत मेहनत का काम है। एक अच्छे दर्जे की क़ालीन महीनों में तैयार होता है। बड़े क़ालीनों के तैयार होने में साल भर से ज़्यादा का समय भी लग जाता है। धागों का रंग पक्का करने के लिए उन्हें तरह-तरह के मसालों में उबाला जाता है। कच्चे रंग का इस्तेमाल करना अच्छा नहीं समझा जाता है। देहाती औरतों को क़ालीबाफ़ी की ख़ास ट्रेनिंग करवाई जाती है। इन क़ालीनों पर उमर ख़ैयाम की शायरी, मौसम ए बहार का मंज़र छापने का बहुत रिवाज़ है। आम तौर पर इस तरह की क़ालीन देखने में आते हैं- क़ालीन नक़्श ए दरख़्त ओ बाग़ (पेड़ों बगीचों के चित्रों वाला) क़ालीन ब नक़्श ए गुलदानी, (गुलदस्तों के चित्रों वाला), क़ालीन ब नक़्श ए शिकारगाह (शिकार के चित्रों वाला), क़ालीन ब नक़्श अशआर ए फारसी(फारसी के शेर ओ शायरी वाला) क़ालीन ब नक़्श ए साक़ी (साक़ी और जाम के चित्रों वाला)।

ईरानी संगीत से बहुत ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं। हिन्दुस्तानी संगीत की तरह उनके संगीत में भी राग रागिनियाँ मौजूद हैं। राग को "दस्तगाह" और रागिनी को "गोशा" का नाम दिया गया है। लेकिन हमारे संगीत की तरह समय, माहौल-मौसम की पाबंदी ज़रूरी नहीं समझी जाती यानी सुबह दोपहर शाम और दूसरे मौसमों के लिए कोई ख़ास राग नहीं है। दस्तगाह और गोशों के नाम अलग-अलग जगहों से जुड़े हुये हैं। जैसे- आहंगदस्ती, दस्तगाह ए इस्फ़हान वग़ैरा। संतूर एवं तार को भी बहुत पसंद किया जाता है। सितार के तार को भी मिज़राब से बजाते हैं। लेकिन ईरान के सितार में बहुत कम तार होते हैं। संतूर भी तारों वाला एक साज़ हैं, जिसको दो छोटी-छोटी छड़ियों की मदद से बजाया जाता है। इस साज़ से ईरानी संगीत में काम लिया जाता है, जो हमारे यहाँ सारंगी से लिया जाता है। यानी कि गाने वाले की ख़ास मदद यही साज़ करता है। गाने वाले जब एक मिसरे या तान को अदा करके छोड़ देते हैं तो संतूरनवाज़ इसी चोट को बहुत पुरसोज़ अंदाज़ में दोहराता है। संतूर से ऐसी धुन निकलता कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं। अक्सर वायलिन से भी यही काम लिया जाता है। लेकिन जो बात संतूर में होती है, वो वायलिन में नहीं हो सकती है। ईरान में संतूर के सबसे बड़े और मशहूर उस्ताद हुसैन मलिक हैं। उस्ताद की उम्र पैतीस से चालीस साल के बीच में है उन्होंने यह कला लगातार रियाज़ से सीखी है। एक लम्बे वक़्त तक यूरोप और पाकिस्तान में रहकर उन्होंने पूर्वी (भारतीय) और पश्चिमी दोनों तरह के संगीत सीखे हैं। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी उन्हें अच्छी जानकारी है। तेहरान के ब्रिटिश दूतावास में भी उन्होंने अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। जहाँ मुझे (लेखक) सुनने का मौक़ा मिला है। उस्ताद हुसैन मलिक ने हमारी राग-रागिनियों को बजाकर अपने देशवासियों को हैरान कर दिया। अच्छे गाने वालों में आक़ाई गुलपायगानी, आक़ाई दीगन, दिलकशखानुम, मर्जिया खानुम और मर्जिया खानुम बहुत मशहूर हैं। ईरानी संगीतकारों में “चहचहाज़नी” और “कोफ़न” बहुत मशहूर है। गाने के बीच से ज़ोर की तान इस आवाज़ से उठाते हैं कि अक्सर बादल की गरज़ और बिजली की कड़क भी इसके आगे फीकी पड़ जाती है। चहचहा मारने वालों में आक़ाई गुल पायगानी का जवाब नहीं। लोकगीतों को भी बहुत पसंद किया जाता है। जैसे तस्नीफ़ महली शीराज़, तस्नीफ़ महली तबरीज़ वग़ैरा।

नाचने में ईरानियों ने कुछ ख़ास ईजाद नहीं किया है। हालाँकि भारतीय नृत्य बहुत कामयाब नहीं है। देहात में मर्द और औरतें मिलकर नाचते हैं, या यूं कहिए थिरकते है, तो उसे रक़्स दस्ता, जमी वग़ैरा कहते हैं। पश्चिमी नृत्य (वेस्टर्न डांस) में चाचा, ट्विस्ट, बेले वग़ैरा का जुनून नौजवानों में ख़ूब पाया जाता है। अब तो घर में नौजवान लड़के-लड़कियाँ उन्हीं की प्रैक्टिस करते हुये नज़र आते हैं।

ईरानी चित्रकार आज भी पुरानी परिपाटी को निभाने और क़ायम रखने की कोशिश में लगे हुये हैं। लेकिन मौजूदा चित्रकारों में एक भी ऐसा नज़र नहीं आता जिसे क्लासिक फ़नकारों की सूची मेँ जगह दी जा सके। ईरानी चित्रकारी का भ्रम आज भी बहज़ाद और रज़ा अब्बास की सुनहरी रिवायत से क़ायम है।

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- क्रमश


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