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ISSN 2292-9754

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04.26.2016


आँखों देखा ईरान
मूल लेखक: प्रो. अमृतलाल “इशरत”
अनुवादक: राजेश सरकार

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ईरान में सूखे मेवे और ताज़े फल बहुतायत से मिलते हैं। इस्फ़हान के तरबूज़ और खुरासान के खरबूज़े बहुतायत से मिलते हैं। सतरहवीं सदी में हिंदुस्तान के मुग़ल बादशाह इन मेवों और फलों को आगरे में मंगाते थे। एक आदमी अपने कंधों पर लकड़ी रखकरके उसके दोनों तरफ़ रस्सी के सहारे दो टोकरी लटका देता था। इन्हीं टोकरियों में एक-एक तरबूज़ या खरबूज़ा रख दिया जाता था, जो गर्मी के मौसम में भी ख़राब नहीं होता था। अस्सी दिन पैदल चलने के बाद ये फल आगरा के बाज़ारों में पहुँचते थे। ये तरबूज़ ख़राब होने से बचाने के लिए ज़मीन में गाड़ दिये जाते थे। ईरानी तरबूज़ों कि बीस से ज़्यादा क़िस्में मौजूद हैं, और यही हाल अंगूर का भी है, जो हद से भी ज़्यादा सस्ते हैं। और आठ दस आने किलो के हिसाब से बिकते हैं। माल्टे के फल को पुर्तकाल कहते हैं और यह ईरानियों को बेहद पसंद है। गर्मी के मौसम में यह फल तोहफ़ों के रूप में भेजा जाता है। खाने की हर दस्तरख़्वान पर यह मौजूद होता है। इसको चूसते वक़्त यह मालूम होना कठिन हो जाता है कि, लाल सफ़ेद ईरानी के गाल से शुरू है और कहाँ ख़त्म, एवं माल्टा कहाँ से। सूखे मेवों में पिस्ता, बादाम, अखरोट, चिलगोजा, मूंगफली वगैरा मेवे बहुत सस्ते हैं। इन सब को मिलाकर बेचते हैं तो इन्हें आजील कहते हैं। इनकी क़ीमत का अंदाज़ इस बात से होगा जो पिस्ता हिंदुस्तान में चालीस-पचास रूपये किलो के हिसाब से मिलता है उससे कहीं ज़्यादा उम्दा पिस्ता ईरान में दस-बारह रुपये किलो के दाम में मिल जाता है।

ईरानी खान-पान में चिल्लो कबाब एक तरह से राष्ट्रीय भोजन है। सूखे चावल और कबाब को दही, मक्खन और मट्ठे वग़ैरा से खाते हैं। चावल में अक्सर कच्चे अंडे भी मिला देते हैं। चावल में अगर सब्ज़ी, गोश्त, और मसाला वगैरा डालकर पकाए तो इसे पोलाव कहते हैं। और अगर सूखा चावल पकाए तो इसे चिल्लो कहते हैं। खाली सब्ज़ी खाने का रिवाज़ बहुत कम है। गोश्त की मिलावट ज़रूरी समझी जाती है। शाकाहारियों के लिए ईरानी दस्तरख़्वान पर बैठना बहुत मुश्किल हो जाता है। चावल में और भी बहुत सी चीज़ें मिलाकर खाते है जैसे मछ्ली, ख़जूर, मुर्ग़, बादाम वग़ैरा भी। रोटी घर में नहीं पकाई जाती है, बल्कि बाज़ार से ख़रीद कर लाई जाती है। जहाँ गैस के बड़े-बड़े तन्दूरों पर तरह-तरह की रोटियाँ तैयार की जाती हैं, यह रोटियाँ जिन्हे ‘नान’ कहाँ जाता हैं, बहुत बड़ी-बड़ी होती हैं। एक आदमी एक रोटी पूरी नहीं खा सकता है। उन रोटियों की ख़ास किस्में ये हैं- बरबरी, तुसतन और लवास वग़ैरा। कबाब ईरानियों का ख़ास खाना है, इसकी भी बहुत सी किस्में है- कबाब कोविदा, कबाब बर्ग, शस्लीक वग़ैरा को बहुत पसंद किया जाता है। कल्ला, पाचा, ज़बान, जिगर, कुलू वग़ैरा के कबाब भी ईरानियों को बहुत पसन्द है। ग़रीब लोग दोनों वक़्त रोटी कबाब खाते है। कबाब के नीचे वाली रोटी को बहुत पसन्द किया जाता हैं। इसी से फ़ारसी में एक कहावत है- नान ज़ीरे कबाब (कबाब के नीचे वाली रोटी) यह बीबी की बहन यानी साली के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

ईरानी अक्सर खुले एवं हवादार मकानों में रहते हैं। घने से घने इलाक़े में भी हर मकान के सामने एक चौड़ा आँगन ज़रूर होगा। जिसको हयात कहा जाता है। चहारदीवारी से घिरे हयात के बीच में गर्मियों में नहाने और पेड़ पौधों को सीचने के लिए एक छोटा तालाब ज़रूर बनाया जाता है। जिसको अस्खर कहा जाता है मकान मालिक के शान ओ शौक़त का अंदाज़ा इसी तालाब से लगाया जाता है। तालाब के चारों ओर ऐसे पेड़ पौधे लगाए जाते हैं, जो फूल देने वाले और ख़ूबसूरती बढ़ाने वाले होते हैं। बहार(बसंत) के मौसम में लोग ज़्यादा से ज़्यादा से वक़्त यहीं बिताते हैं। शहरों के मकान दो मंज़िल, तीन मंज़िल, और चार मंज़िल तक होती हैं। एक मंज़िल नीचे भी बनाई जाती है। जिसे फ़ारसी में ‘ज़ेर ए ज़मीनी’ कहते हैं। गर्मी के मौसम में लोग यहीं इकट्ठे रहते हैं। तेहरान में नए मकान ज़्यादातर इसी तर्ज़ के बने हैं, जो सर्दियों और गर्मियों दोनों के लिए बेहद आराम-दायक होते हैं। उताक़ ए पज़ीराई (Guest Room) को ख़ास तौर पर सजाया जाता है। कालीनों, पर्दों और दूसरे सामानों का उम्दा होना घर वाले की हैसियत पर होता है। घुले-मिले और गहरे दोस्त ज़मीन पर ही बैठते हैं, और क़ालीन पर लेटे-लेटे चाय और कहवा वग़ैरा पीते रहते हैं। ‘समावर’ हर घर के सामान का ज़रूरी हिस्सा है। सुबह का पहला काम समावर जलाकर कहवा की तैयारी है। पिकनिक पर जाते वक़्त समावर ज़रूर रखते हैं। सही बात तो यह है कि समावर और क़ालीन के बिना एक ईरानी की ज़िंदगी अधूरी समझी जाती है। सामाजिक शिष्टाचार, दोस्ताना अंदाज़, मेहमाननवाज़ी, रख-रखाव में दुनिया की बहुत कम जातियाँ होंगी, जो ईरानियों का मुक़ाबला कर सकें। बच्चों को आँखें खोलने के साथ ही तौर तरीक़े और सामाजिक शिष्टाचार सिखाये जाते हैं। यही वज़ह है कि ईरानी बच्चे ख़ूबसूरती के साथ-साथ अपने अच्छे एवं नैतिक व्यवहारों के लिए भी मशहूर हैं। ईरानियों की उच्च नैतिकता का ज़िक्र पुरानी क़िताबों में भी मौजूद है।

नए पश्चिमी संस्कृति के बावजूद ईरानी अभी भी परम्परा को निभा रहे हैं। घर में मेहमान का आना अच्छी क़िस्मत का नतीजा समझा जाता है। मेहमान के स्वागत में तरह-तरह की बातें बोली जाती हैं। जो मेज़बान के प्यार और ख़ुशदिली को बयान करता है। जैसे- ‘अज़ीज़म बफरमा-ईद, बर्ग ए गुलू आबुर्दे अस्त बाद’ यानी अज़ीज़ तशरीफ़ लाइये, यह आप नहीं हैं मानो हवा फूलों की पत्ती उड़ा कर लाई हो। प्यार से मेहमान को चूमना ज़रूरी समझा जाता है। इस तरह घर का मालिक और दूसरे सदस्य मेहमान को चूमने के लिए घर के बाहर इंतज़ार करते हैं। जब सब लोग इस काम को कर चुके होते हैं तो घर में आते हैं। दोस्तों और मेहमानो से इतनी ख़ुशदिली और मुहब्बत से मिलते हैं, कि फ़ारसी में कही गई इस कहावत का मतलब समझ में आता है- ‘बेगाना व दूर उफ़तादा आन कसी अस्त कि ऊरा दोस्त नीस्त’ यानी बेगाना और दूर रहने वाला वो है जिसके कोई दोस्त न हो। कैसी भी औपचारिकता क्यों न हो सामाजिक तौर तरीक़ों का ख़याल रखा जाता हैं। किसी की ओर पीठ करके बैठना बहुत ही बुरा समझा जाता है। अगर यह हालत मजबूरी में हो तो बैठने वाला हज़ार बार खेद व्यक्त करता है। दूसरे लोग एक खास शायराना अंदाज़ में जवाब देते है- बैठे रहिए जनाब फूल पीठ या चेहरा नहीं रखता। किसी से कोई चीज़ लेकर फौरन ही कहा जाता है- “दस्ते शुमा दरदनकने यानी आप का हाथ सलामत रहे। किसी चीज़ की तारीफ़ कीजिये मालिक फौरन कहेगा- “चश्महात तिश्नगे" यानी यह चीज़ ख़ूबसूरत नहीं बल्कि आप की आँख ख़ूबसूरत है, जो इसे ख़ूबसूरत बना रही है। एक दोस्त किसी दोस्त से किसी दिलकश महफ़िल का ज़िक्र कर रहा है। पहले यही कहेगा- ‘जाए शुमा ख़ाली, शब खेली ख़ूब गुज़श्त’ यानी रात को मज़ा तो बहुत रहा लेकिन आप की कमी बहुत खली। दूसरे की तारीफ़ आपके सामने करेंगे तो पहले यह कहेंगे- “मिस्ले शुमा न बूदी बाजहम” यानी कैसा भी हो आप जैसा नहीं था। किसी से मिलने पर ”सलाम आक़ा” और विदा होते वक़्त “ख़ुदा हाफ़िज़” कहना फ़र्ज़ समझा जाता है। विदेशी और अपरिचित की इज़्ज़त करना ईरानियों के लिए धार्मिक कर्तव्य की तरह है। सिनेमा और बस के टिकट के लंबी लाइन लगती है, लेकिन विदेशी दिख जाए तो फ़ौरन उसे सबसे पहले जगह दी जाएगी। ट्रेनों बसो में किसी ईरानी को हटाकर विदेशी को बैठाते हैं, और कहते हैं – आक़ा बफरमाईदशुमा मेहमान ए मा हस्तीद” यानी श्रीमान आप बैठिए आप हमारे मेहमान हैं। घरों में पेइंग गेस्ट पर मेहमान रखने का रिवाज है, आपको घर के एक सदस्य की तरह समझा जाएगा सब लोग आपके रस्म ओ रिवाज़, संस्कृति के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए बेहद उतावले नज़र आयेंगे। आपके हालात जानने के फ़ौरन बाद आप से सवाल किया जाएगा कि आपको ईरान कैसा लगा? यह ज़रा सा टेढ़ा सवाल है। ईरान की तारीफ़ करना आपका फ़र्ज़ है, वरना महफ़िल में बैठे हुये ईरानी के माथे पर शिकन पड़ जाती है। ईरानियों का देश एवं संस्कृतिप्रेम कट्टरता की हद तक पहुँचा हुआ है।

कपड़ों-पहनावों के मामले में ईरानी मर्द और औरत पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति कि राह पर हैं। लेकिन एक बात बड़ी दिलचस्प है कि अक्सर ईरानी अपने हाथ में तस्बीह (जपमाला) रखते हैं अमीर लोग बहुत क़ीमती एवं रात को चमकने वाली तस्बीह थामें रहते हैं। नए आए हुये के लिए यह नज़ारा अजीब सा दिखाई देता है, क्योंकि अक्सर एक हाथ में जाम और दूसरे हाथ में तस्बीह भी रहा करती है। सवाल करने पर मालूम होता है कि यह ईरानियों के सूफ़ी मिजाज़ को बयां करता है। इस का दीन ओ धर्म से कोई नाता नहीं है। शायद इसी लिए यह शेर भी प्रचलित है, जिसे जनाब नज़ीर बनारसी साहब कहा करते थे-

“मय भी अपनी ज़ाहिदाना शान से ढलती रही।
जाम भी चलता रहा तस्बीह भी चलती रही।"

ईरानी शेर ओ शायरी से बड़ी दिलचस्पी और लगाव रखते हैं। मौक़ों के हिसाब से महफ़िल में चुने हुये साहित्यिक वाक्यों का प्रयोग करना बड़ा प्रचलित है। शेर ओ शायरी कहना हर ईरानी की ख़ासियत है। आप किसी ऐसे आदमी को जानते हो, जो हर मौक़ों और माहौल के हिसाब से दो चार शेर हाज़िर कर सकता हो। इसकी बिना किसी लाग लपेट के तारीफ़ कीजिये फौरन कहेगा जनाब मैं शेरो-शायरी कहाँ जानता हूँ। शायर होना ईरानी के लिए इतनी आसान बात नहीं है। ईरान में शायर होना इतना आसान नहीं समझा जाता है। हालाँकि हर ईरानी के रग-रग में शायरी भरी हुई है। ईरान में मुशायरे का रिवाज़ नहीं है, जो हमारे यहाँ है। किसी ख़ास कार्यक्रम में चयनित विषय पर शेर पढ़ने के लिए शायर को दावत दी जाती है। शायर मंच पर खड़े होकर अपना कलाम ज़ोर-ज़ोर से सुनाता है। आवाज़ विषय के मुताबिक धीमी या तेज़ होती है। तरन्नुम (लय) में पढ़ने का रिवाज़ नहीं है। श्रोता हर शेर पर वाह-वाह, सुबहान-अल्लाह, मरहबा, आफ़रीन-आफ़रीन नहीं कहते हैं। दाद देने के लिए शोर-गुल से आसमान सर पर नहीं उठाया जाता है। अच्छे शेर से छत नहीं उड़ जाती। शेर को चुपचाप सुना जाता है और साहित्यिक सौन्दर्य पर विचार किया जाता है। कार्यक्रम की समाप्ति पर हर आदमी अपने हिसाब से शायर की तारीफ़ या बुराई करता है। कुछ लोग शायर को घेर कर खड़े हो जाएँगे और उसके अशआर पर बातचीत करेंगे। यहाँ पर गौर करने की बात यह है कि ईरानियों की समालोचना की कसौटी हमारे यहाँ से बहुत कुछ अलग है। आलोचना का मतलब बुराई बिलकुल नहीं है जिसे ईरान के प्रसिद्ध कवि हाफ़िज़ शीराज़ी ने इस तरह कहा है-

“कमाल ए सिर्र ए मुहब्बत बबीन न नक़्श गुनाह”
कि हरके बीहुनर उफ़्तद नज़र बी ऐब कुनद।

मुहब्बत के रहस्य के कमाल को देखो न कि गुनाह के नक़्शे को। जिसके अंदर कोई खूबी नहीं वह हर जगह बुराई ही देखता है।

पैरोडी का बहुत रिवाज है। इस मामले में बड़े बड़े शायरों को भी माफ़ नहीं किया जाता है। हाफ़िज़ शीराज़ी का मशहूर शेर है-

“अगर आन तुर्क ए शीराज़ी बदस्त ए आरद दिल ए मारा।
बखाल हिन्दुअश बख्शम समरक़ंद ओ बुखारारा।"

अगर वह शीराज़ की रहने वाली माशूका हमारा हाथ थाम ले। तो उसके दिलफरेब तिलों के ऊपर मैं समरक़न्द और बुख़ारा लुटा दूँ।

खुद उसकी मातृभूमि शीराज़ में इस शेर की कुछ इस तरह पैरोडी की गई है-

“अगर आन की चीज़ मी बख्शद ज़ ज़ेब ए खीश मी बख्शद। “
न चून हाफ़िज़ कि मी बख्शद समरक़न्द ओ बुख़ारारा।

वह जो कुछ भी बख़्श रहा है, वह अपनी ज़ेब से बख़्श रहा है। न की हाफ़िज़ की तरह जो समरक़न्द और बुख़ारा को लुटा रहा है।

श्रोता इस तरह के कार्यक्रमों से बहुत प्रभावित होते हैं। मैंने ऐसे कई कार्यकर्मों में भाग लिया है, मनुष्य की ऐसी स्मरण क्षमता देखी। जिसकी मिसाल मिलना कहीं भी मुमकिन नहीं। एक-एक शब्द पर हज़ारों शेर, क़सीदों पर कसीदे कहना ज़बान की नोक पर होता है।

इस सिलसिले में तेहरान विश्वविद्यालय के उन अध्यापकों के चेहरे नज़र में घूम जाते हैं जिनसे हज़ारों ईरानी और ग़ैर ईरानी छात्र फायदा उठाते रहे हैं। कक्षाओं में अक्सर यह लोग साहित्य की शिक्षा अपनी याददाश्त के बल पर ही देते रहे हैं। इन उस्तादों में सम्माननीय डॉ. हुसैन खतीबी, डॉ. मुईन, डॉ. फिरोज़ाफ़र, डॉ. सईदनफ़ीसी, दिवंगत डॉ. रज़ा ज़ादा शफ़क़, डॉ. ज़बीहुल्लाह सफ़ा के नाम किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है। ऐसा लगता है कि इन लोगों ने फ़ारसी साहित्य घोल कर पी लिया हो।

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- क्रमश


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