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ISSN 2292-9754

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04.26.2016


आँखों देखा ईरान
मूल लेखक: प्रो. अमृतलाल “इशरत”
अनुवादक: राजेश सरकार

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ईरान के हम्माम और कहवाखानों का ईरान की ज़िंदगी में ख़ास अहमियत है। घरों में गुस्ल-ख़ानों (Bathroom) का रिवाज बहुत कम है। हर सड़कों, हर गलियों में एक हम्माम ज़रूर होता है, जिसके दो हिस्से होते हैं-एक मर्दाना और एक ज़नाना। अलग-अलग कमरों में ठंडे और गर्म पानी के नल होते हैं। जहाँ लोग अपनी मर्ज़ी के हिसाब से जाते हैं। मालिश और मसाज़ करने वाले भी मौजूद होते हैं, जो वाजिब क़ीमत पर काम को अंजाम देते हैं। हम्माम में खाने-पीने की चीज़ें भी बिकती हैं। राजधानी तेहरान में माडर्न स्टाइल के हम्माम बहुत दिखते हैं। जहाँ एक-एक कमरे में बीस-बीस कमरे होते हैं। कमरों के फर्श और दीवारें सफ़ेद टाइलों से बनाई जाती हैं। गुरुवार और शुक्रवार (जुमा) को यह हम्माम दोस्तों के मिलने की जगह बन जाते हैं। रूमानियत से भरी सुबह गुज़ारने के लिए हम्माम ख़ास ख़याल किए जाते है। अपनी-अपनी बारी का इंतज़ार करते हुये लोगों के लिए चाय, हुक़्क़े और अख़बार इंतज़ाम किया जाता है।

कहवाखानों में चाय और हुक्कों के अलावा फ़िरदौसी के शाहनामें को सुनाने वाले लोग भी मिल जाते है। उन लोगों की याददाश्त बड़ी तेज़ होती है। यह लोग शेर को एक ख़ास अंदाज़ में पढ़ते हैं। बड़े तख़्त लगाकर उन पर क़ालीनें बिछाई जाती हैं। दीवारों पर टँगें हुये गलीचे पर शाहनामा या उमर ख़ैयाम की रुबाइयों के दृश्य बने होते हैं। चाय गिलासों में पेश की जाती है। इन गिलासों को ‘इस्तकान’ कहा जाता है। इस चाय में दूध का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ये कहवाखाने दोस्तों और मिलने-जुलने वालों की भीड़ से भरे होते हैं। ईरान की जनता फुरसत का वक़्त यहीं गुज़ारती है। बड़े-बड़े शहरों में इन कहवाखानों की जगह होटलों और बीयरबार ने ले ली है। ईरान की सड़कों पर हर तीसरी या चौथी दूकान शराब की है।

शराब आम तौर पर बहुत सस्ती है। ईरान में वोदका और शीराज़ी शराब जिसे ख़लार कहते हैं, बहुत सस्ती और बहुतायत से मिलती है। तेहरान के काफी बीयरबार और मयख़ाने ऐसे हैं जहाँ साक़ी का फर्ज़ औरतें पूरा करती है। यह ज़्यादातर आर्मेनियन या यहूदी औरतें हैं। ऐसी जगहों पर जन्नत की हूरों और गिलमा की कल्पना साकार हो उठती है। इन रंगीन जगहों पर बाज़ारू हूरों के साथ-साथ गिलमा भी दिखाई देते हैं। शाम ढले हज़ारों सूरज चाँद के चमक उठने पर उनकी रोशनी में बड़े-बड़े ख़ानदानी लोग भी नंगे नज़र आते हैं।

ईरानी त्योहारों में जश्न ए नौरोज़ हमेशा से ही जोशो खरोश और उमंग से मनाया जाता रहा है। मौसम ए बहार (बसंतऋतु) की दस्तक देने वाला यह त्योहार तेरह दिनों तक लगातार ज़ारी रहता है। दफ़्तरों, स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी हर जगह छुट्टी रहती है। यहाँ तक कि इन दिनों में अख़बार भी बंद रहते है। नौरोज़ इक्कीस मार्च से शुरू होता है। त्योहार से पंद्रह दिन पहले हर घर में गेहूँ बोया जाता है, जो कि शुद्ध आर्य परंपरा है। ईरानी नव वर्ष भी नौरोज़ से शुरू होता है। पुराने साल के आख़िरी बुधवार को “चहारशम्बासूरी” का त्योहार मनाया जाता है। सूखी लकड़ी को जलाकर घर के हर लोग उस आग को लाँघते हैं, और उसके बाद उस आग को चौक में बिखेर दिया जाता है। । पुरानी चीज़ें बदल कर नई लाई जाती हैं। नौरोज़ के एक दिन पहले घर के हर कमरे में दिये जलाए जाते हैं, और एक लंबे-चौड़े दस्तरख्वान का इंतज़ाम किया जाता है। दस्तरख्वान के बीच में एक आईना और बहुत से दिये जलाकर रखे जाते हैं। इसी पर एक बहुत बड़ी ट्रे में फ़ारसी के सीन अक्षर से शुरू होने वाली सात चीज़ें रखी जाती हैं जो ये हैं- सपंद, सेब, सीर (दूध), सिरका, समनू (गेहूं के आटे का बना हलवा), सब्ज़ा (हरी चीज़ें), सुमाक (अनार का दाना)। इन दिनों दोस्तों, रिश्तेदारों, मेहमानों का मिलना-जुलना शुरू हो जाता है। मेहमानों के स्वागत के लिए एक ख़ास तरह का दस्तरख्वान बिछाया जाता है। मेहमान यहाँ से मिठाई और दूसरी खाने-पीने की चीज़ें उठाकर खाते-पीते हैं, और खाली तश्तरियों-प्लेटों को फिर से भर दिया जाता है। हिंदुस्तान की तरह बच्चों और दूसरे प्रियजनों को भेंटस्वरूप पैसे भी दिये जाते हैं। नौरोज़ के तीसरे दिन “सीज़्दह बदर” का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन घरों मेंबोये गए गेहूँ को पानी में बहा दिया जाता है। सब लोग आबादी से दूर हरे-भरे बाग़ों पहाड़ों में चले जाते हैं। खाने-पीने का ज़्यादा से ज़्यादा सामान साथ में रहता है। सारा दिन सैर–सपाटा और मौज मस्ती में बिताने के बाद लोग रात को घरों में लौटते हैं। लोगों का विश्वास है कि इस तरह बहार (बसंत) का स्वागत भी हो जाता है, और बीते साल कि परेशानियाँ भी दूर हो जाती हैं।

एक और ख़ास बात जो नौरोज़ के बारे में देखने में आती हैं कि लोग एक शहर से दूसरे शहर सैर भी करते हैं। इन दिनों तेहरान के लोग इस्फ़हान, शीराज़ वगैरा कि तरफ़ जाते हैं, और शीराज़ इस्फ़हान के लोग राजधानी तेहरान में दिखाई देते हैं। हर शहर में नौरोज़ के मुसाफ़िरों कि खूब चहल-पहल रहती है। शहर की म्यूनिसिपालिटी की ओर से मुसाफ़िरों के ठहरने का बहुत अच्छा इंतज़ाम किया जाता हैं। होटलों का किराया पहले से ही तय कर दिया जाता है, जिससे मुसाफ़िरों से ज़्यादा पैसे न लिए जाये। शहरों के दर्शनीय स्थानों के लिए बसों और टैक्सी का इंतज़ाम किया जाता है। नाचने, गाने, गीत संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। चारों ओर उमंग ही उमंग दिखाई देती हैं। नौरोज़ के समय ईरान की आबोहवा कुछ इस तरह खुशगवार हो जाती है कि मुर्दादिल इंसान के दिल में भी जीने कि उमंग हो जाती है। पतझड़ के मुरझाएपन के बाद ईरान के बसंत कि यह हरियाली दुनिया भर में बेमिसाल है।     

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- क्रमश


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