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ISSN 2292-9754

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04.26.2016


आँखों देखा ईरान
मूल लेखक: प्रो. अमृतलाल “इशरत”
अनुवाद्क: राजेश सरकार

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यूरोप और अमेरिका से आने वाले पर्यटकों के लिए नए ईरान का माहौल पहली बार में बहुत कुछ अलग नज़र नहीं आता है, लेकिन एक भारतीय को यह दुनिया पूरी तरह से नई दिखाई देती है। पश्चिमी संस्कृति की छाप यद्यपि बहुत गहरी नहीं दिखाई पड़ती, लेकिन नए आए हुये को थोड़ी देर तक यह एहसास ज़रूर रहता है, कि यह हाफिज़ शीराज़ी और उमर ख़ैयाम का वह देश नहीं है, जिसकी झलक उसे फ़ारसी साहित्य में मिली थी। पश्चिमी कपड़ों में लिपटी औरतें ईरानी से ज़्यादा अमेरिकी दिखाई देती हैं। ब्लाउज़, स्कर्ट, कोट, पैंट और नेकटाई ने देहातों और गाँवों में भी अपना दबदबा बना लिया है। गोरे चिट्टे ईरानियों का हुस्न हमेशा से दुनिया में बेमिसाल रहा है। पगड़ी, टोपी, चोंगे और नक़ाब से आज़ाद होकर अब इसके हुस्न की शोहरत पूरी दुनिया में फैल रही है। शीराज़ और इस्फ़हान जैसे शहरों में कहीं-कहीं पुराने रिवाज़ भी दिख जाते हैं। उनकी गलियों से गुज़रते वक़्त कभी-कभी यह सोचना भी कठिन हो जाता है कि हम एशिया के किसी मुल्क कि राजधानी में हैं।

ईरान कि आबादी लगभग दो करोड़ है। उसमें से लगभग बीस लाख लोग क़बाइली ज़िंदगी गुज़ारते हैं। तीस लाख कि आबादी शहरों में रहती है। बाक़ी के लोग देहातों में काश्तकारी करते हैं। लोगों के लगातार देहातों से शहरों की ओर बसने से शहरों की आबादी में इज़ाफ़ा हो रहा है और गाँव वीरान हो रहे हैं। इसीलिए राजधानी तेहरान की आबादी बीस-पचीस सालों में दोगुनी हो गई है। अब भी यहाँ कम से कम पचीस लाख लोग रहते हैं। ईरानी और भारतीय एक ही नस्ल के हैं। इन आर्य नस्ल में सातवीं सदी के अरब हमलावर और दसवीं-चौदहवीं सदी के दौरान आने वाले तुर्क या तूरानी क़बीले इस तरह घुलमिल गये हैं कि अब इन सब को अलग-अलग करना नामुमकिन है। ईरान को एक लड़ी में पिरोने का काम भाषाई एवं धार्मिक एकता ने किया है। शिया मत ने सारी जातियों को एक ही रंग में रँग दिया है। लेकिन इसके बाद भी दूसरी जातियों एवं धर्मों के लिए सम्मान के भावों की भर-मार है। खानाबदोश जातियों में काशकाई, बख़्तयारी, ख़म्सा शाहसिओन, बलूच, कुर्द क़ाबिले ज़िक्र हैं। कुर्द, बख़्तयारी और सुरक़बीले की बोलियाँ प्राचीन फ़ारसी से निकली हैं। काशकाई, खम्सा और शाहसिओन क़बीले की बोलियाँ तुर्की है। ईरान के सीस्तान- बलूचिस्तान प्रांत के रहने वाले बलूच अपनी भाषा को बलूची कहते हैं। लेकिन यह बोली प्राचीन पहलवी भाषा की एक शाखा है, और पाकिस्तान के हिस्से वाले बलूचिस्तान की बलूची से अलग है। इस क़बीले के लोग प्रायः बहुत बहादुर और निडर होते हैं। खुली हवा में रहने की वज़ह से बहुत तंदरुस्त और मज़बूत क़द काठी के हैं। बहुत से ईरानी शाही ख़ानदान इन्हीं क़बीलों से सम्बन्ध रखते थे। गर्मी के मौसम में यह घुमंतू क़बीले इराक़ की सीमा के क़रीब या फ़ारस की खाड़ी के तटवर्ती इलाक़ो में रहकर खेती-बाड़ी में लग जाते हैं, और बसंत की शुरुआत में पहाड़ी इलाकों की ओर चले जाते हैं। जहाँ उनके मवेशियों के लिए चारागाह का इंतज़ाम हो जाता है। क़बीले का सरदार ख़ान कहलाता है। सब लोगों के लिए उसका हुक्म क़ानून की हैसियत रखता है। इन सरदारों में से अक्सर उच्चशिक्षित हैं। शीराज़ के पास क़ाज़रोन इलाक़े में गार ए शाहपुर की तलहटी में रहने वाले सरदारों में से कई ऐसे भी हैं, जिन्होंने यूरोप में शिक्षा पाई है, और इनकी बीबियाँ भी यूरोपियन हैं। इन सरदारों ने शहरों में भी अपनी जायदाद बनाई है, लेकिन इसके बाद भी वह अपने क़बीले के साथ इसी तरह रहना ज़्यादा पसंद करते है। ये लोग भेड़ों की ऊन से बने तम्बुओं में रहते है। क़ीमती क़ालीनों, कम्बलों और विदेशी बंदूकों को शान ओ शौक़त का सामान समझते हैं। सरदारों के तम्बू का हिस्सा मेहमानख़ाने का काम देता है। यहाँ मेहमानों के लिए हर तरह का आराम और सामान मुहैया करवाना क़बीले का अहम फ़र्ज़ समझा जाता है। आबादी से कोसों दूर रहने के बावजूद इनके मेहमानख़ानों में फ्रिज और उन में जर्मन बीयर तक की कमी नहीं दिखती है। पहले इनका पेशा राहज़नी और लूटमार था। लेकिन अब यह लोग काफी हद तक सुधर गए हैं। जानवरों और क़ालीनों को ख़रीदना बेचना इनका कारोबार है।

ईरान में हमेशा बहने वाली नदियों की कोई कल्पना ही मौजूद नहीं है। खेती-बाड़ी का काम तालाबों, नहरों, नालों के किनारे अंजाम दिया जाता है। इन्हीं खेतों के आस-पास गाँव बसाये जाते हैं। ईरानी गाँव अक्सर मिट्टी के बने होते हैं। गाँव की मस्जिदों का रंग नीले या हरे रंग की टाइलों से तैयार किया जाता है। जो सूरज की रोशनी में झिलमिलाता रहता है। आज से पंद्रह-बीस साल पहले डाकुओं के डर से हर गाँव के चारों ओर एक मज़बूत दीवार बनाई जाती थी। जिसमें सिर्फ़ एक दरवाज़ा रखा जाता था। अब यह दीवारें गिरा दी गई हैं। ईरानी किसान की ज़िन्दगी शायद भारतीय किसान से बेहतर है, एक तो इसके पास गलीचे - कंबल वगैरा होते हैं। और दूसरा की इन सबका खान-पान अच्छा है, क्योंकि दही, दूध, मट्ठा, अंगूर, सेब वगैरा की अधिकता है, यह सब चीज़ें इनके रोज़ाना के खान-पान का ज़रूरी हिस्सा है। आम तौर पर हर देहाती घरों के आगे एक चौड़ा कच्चा सहन होता है, जिसके बीचों-बीच एक तालाब बनाया जाता है। पेड़ों और फूल पौधों से घिरा यह तालाब नहाने धोने के काम आता है। पीने का पानी तालाबों से ही लिया जाता है। पुरुष खेती-बाड़ी का काम करते हैं और औरतें क़ालीन बुनाई का काम देखती हैं। मेहमाननवाज़ी में पुरानी परम्पराएँ बहुत अच्छी तरह से निभाई जाती हैं।

ईरान के शहर व्यापारिक सड़कों पर बसाये जाते थे, ताकि दूसरे देशों को जाने वाले क़ाफिलों और कारवानों से लेन देन हो सके। कुछ शहर राजधानियाँ बनाई गईं, इसलिए इन की अहमियत में इज़ाफ़ा होता गया। तबरेज़, मुरागाँ, सुल्तानिया, कज़्वीन, इसफ़हान, शीराज़ और तेहरान इसी तरह के शहर हैं। मशहद, किरमान, क़ुम, यज़्द धार्मिक दृष्टि से महत्त्व रखते हैं।

रज़ा शाह कबीर पहलवी के सत्ता में आने के बाद ईरानी शहरों की काया पलट हो गई है। लगभग सभी शहर एक ही नमूने पर बनाए गए हैं। यहाँ सड़के चौड़ी और साफ सुथरी हैं। बाज़ार शहर के पुराने हिस्से में बनाए गए हैं। इनके ऊपर दूर तक छतें होती थीं। कुछ पुराने बाज़ार इसी हालत में आज भी मौजूद हैं। लेकिन शहरों में पश्चिमी शैली के बिज़नेस सेंटर और शॉपिंग माल खुल जाने से इन बाज़ारों की चमक फीकी पड़ गई है। ईरान के बाज़ारों में अमेरिका और यूरोप की चीज़ें अधिकता से मिलती हैं। कपड़े और हर तरह की मशीनों को छोड़िए, ताज़ा अमेरिकी अंडे और डेनमार्क का ताज़ा मक्खन भी मिल जाता है। जल्द ख़राब होने वाली चीज़ें रोज़ाना हवाई जहाज़ से मँगाई जाती हैं। छोटी-छोटी दूकानों पर भी इस तरह के साइनबोर्ड नज़र आ जाते हैं, जिन पर लिखा होता है ’चाय जहान’, ‘पतवी जहान’ यानी दुनियाँ भर की चाय और दुनिया भर के कंबल। यही हाल कपड़ों का भी है, हर देश और हर फैशन के कपड़े आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन बहुत ज़्यादा क़ीमत पर। सट्टे का बहुत रिवाज है। दूकानदार जिस चीज़ की क़ीमत एक सौ तूमान बताए। ग्राहक का यह फर्ज़ है कि इसके दस तूमान पेश करे। अब उधर कमी और इधर से बेसी का सिलसिला शुरू हो जाता है। जिसको आम चलन में ‘चान ए ज़नी’ कहा जाता है। आखिर बीस -पचीस तूमान में मामला तय हो जाता है। विदेशियों से इस तरह का व्यवहार आम है। दस तूमान का सामान सौ तूमान में बेच देना एक ईरानी के बाएँ हाथ का खेल है।  

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- क्रमश


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