अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.08.2015


फेसबुक

"अबे साऽऽले मैं आधे घंटे से तेरे सामने बैठा हूँ। तेरे डब्बे के सारे बिस्किट खा चुका। अपना और तेरा, दोनों चाय का कप शेष कर डाला। लेकिन तू है कि कम्प्युटर से नज़र ही नहीं हटाता। साले अब तू कम्प्युटर चला और मैं चला।" मैं गुस्से से कुर्सी से उठते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा। गुस्सा आना भी स्वाभाविक था। मेरा इसके यहाँ आये आधे घंटे से ज्यादा बीत चुका था। वह बिना कम्प्युटर के स्क्रीन से नज़र हटाये मुझे बैठने को बोलकर फिर कम्प्युटर पर व्यस्त हो गया था।

मुझे गुस्से से निकलते देख वह बोला, "नहीं यार। दो मिनट और बैठ। मैं "फेसबुक" पर स्टेटस अपडेट कर रहा हूँ। प्लीज़ यार। अभी तुरंत हो जायेगा। लगभग समाप्त हो चुका है।"

मैं फिर से बैठ गया और उसको सुनाते हुए धीरे-धीरे बोलने लगा, "ये कौन साला फेसबुक लाया। लोगों को बात करने की भी फुर्सत नहीं। जिसे देखो वही कम्प्युटर पर, लैपटॉप पर, मोबाईल पर फेसबुक खोलकर बैठ जाता है। दुनिया जाये भाड़ में इन लोगों को अपने फेसबुक स्टेटस अपडेट करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण काम कोई नज़र ही नहीं आता।" रास्ते में, मॉल में, ऑफिस में, ट्रेन में, बसों में, घरों में दिन-रात केवल फेसबुक से चिपके रहते हैं। अब बच्चे और युवाओं की कौन कहे अधेड़ और बूढ़े भी फेसबुक से चिपकने लगे हैं। इतना ध्यान यदि समाज सेवा में लगाते तो अपना देश कहाँ से कहाँ पहुँच गया होता।

उसने अब जाकर मॉनिटर से नज़र हटायी और हाथों की उँगलियों को सीधा करते हुए बोला, "सुन बेटे तू जिस विषय को नहीं जानता उस पर ना ही कोई कमेंट कर तो अच्छा। राजनीति पर बोल कोई कविता सुना या कौन सी कहानी लिख रहा है उसपर चर्चा कर। तेरे मुँह से राजनीति, साहित्य, कविता, शेरो-शायरी ही अच्छी लगती है। कम्प्युटर पर तो एकदम बोलना छोड़ दे। फेसबुक से तो तेरी एलर्जी है एकदम नाम मत ले। फेसबुक का नाम ही सुनकर तेरे उसमे खुजली होने लगाती है। इसलिए तू फेसबुक से दूर रह।"

"हाँ बेटा फेसबुक तो तेरा बाप है ना। उसके बिना तू कैसे रह पायेगा। वही तो तेरा खर्चा चलाता है," मैंने उसे उत्तेजित करने का प्रयास किया।

लेकिन वह बिना उत्तेजित हुए दार्शनिक अंदाज़ में बोला, "फेसबुक एक सोशल मीडिया है। इसके द्वारा उन लोगों से दोस्ती और जान-पहचान की जाती है जिससे हम दूर रहने के कारण मिल नहीं पाते। उनके सन्देश प्राप्त कर सकते हैं और अपना सन्देश उनतक पहुँचा सकते हैं। देखो जब से मैंने फेसबुक में अपना अकाउंट खोला है मेरे सैकड़ों मित्र बन गए हैं। कुछ तो ऐसे भी है जिन्हें मैं स्कूल छोड़ने के बाद एकदम से भूल गया था। कुछ विदेशों में जा बसे पुराने मिरों से रोज़-रोज़ फेसबुक के माध्यम से संपर्क बना रहता है। हम एक दूसरे के पूरे दिन के क्रिया-कलाप को शेयर करते हैं। ऐसा लगता है कि हम दूर होकर भी एक ही घर में रह रहे हों।"

वह और कुछ सुनाता उसके पहले ही मै बोल उठा, "इस तरह की काल्पनिक सोसायटी बना कर किसी का भला नहीं हो सकता। किसी का भला चाहने के लिए "फेसबुक" नहीं "फेस टू फेस" की ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है। राजनीति और प्रत्यक्ष समाज सेवा के माध्यम से समाज को सही दिशा में ले जाया जा सकता है। फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग की सहायता से अप्रत्यक्ष कम्युनिटी बनाकर केवल अफवाह फैलायी या दंगा भड़काया जा सकता है।"

मेरी बातों से वह तिलमिला गया और ऊँची आवाज़ में बोला, "इसलिए मै कहता हूँ कि तू कम्प्युटर से सम्बंधित कुछ ना बोल। सोशल नेटवर्किंग पर तो एकदम चुप रह।" फिर मुझे सलाह देने लगा, "अब तो अपने को अपडेट कर। तू तो जनता है कि आजकल समाज सेवा का सबसे बढ़िया माध्यम सोशल नेटवर्किंग है। हज़ारों-लाखों नहीं करोड़ों लोग इससे जुड़े हैं। पिछड़े और ज़रूरतमंद लोगों की आवाज़ को इसी मंच से उठाया जाता है और उन्हें इसी मंच से जो सहायता मिलती है वह तुम्हारे राजनेता कभी नहीं कर पाएँगे। कल ही एक पोस्ट किया गया था कि एक माँ अपने बच्चे के किडनी प्रत्यारोपण के लिए दान चाहती है। महिला बहुत गरीब थी और उसका बच्चा बड़ा होनहार, दसवीं कक्षा में पढ़ता था। लोगों ने एक दिन में ही उसे करीब दस लाख दान में दिए। तुम्हारे राजनेता होते तो क्या ऐसा सम्भव था?"

मैं भी उसके बातों से प्रभावित होने लगा फिर अचानक ख्याल आया कि नहीं मुझे इस सोशल नेटवर्किंग के दलदल में नहीं पड़ना। अतः मैंने उससे अब इस मुद्दे को यठीं बंद करने का अनुरोध किया और बोला, "ठीक है अब तू बंद कर। मैं जिस उद्देश्य से यहाँ आया था वह सुन। मिश्रा काका हॉस्पिटल में भर्ती है।"

"कौन मिश्रा काका?" उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

"अरे! यार! तेरे बिल्डिंग के सोलह नंबर क्वार्टर वाले।"

"ओ अच्छा, हाँ समझा। वो बूढ़े काका। कभी भी बाहर दिखाई नहीं देते।"

"साले दिखते नहीं कि तू देखता नहीं। तू बाहर निकलेगा तो तू जानेगा ना।"

"हाँ क्या हुआ उनको?" उसने मुझसे जानना चाहा।

"कल बाज़ार से लौटते समय मोटरबाईक से टकरा गए। सर फट गया। बहुत खून निकला है। मैं बाज़ार में ही था। हास्पिटल में भर्ती कराया।"

"हाय! - ये तो बहुत बुरा हुआ। बड़े सज्जन व्यक्ति हैं। हमेशा मुझे बेटा कहकर पुकारते हैं।"

"तो तू सुन उनके प्राथमिक इलाज के लिए जो खर्च लगा वह मैंने चुकता कर दिया है। अब सम्भवतः उनके सर की सर्जरी करवानी पड़ेगी। काफी रुपये की ज़रूरत है। उनके परिवार वालों को खबर देनी होगी।"

"उनका तो शायद कोई नहीं है। मैंने कभी किसी को उनके यहाँ आते जाते नहीं देखा।"

"तू देखेगा भी कैसे? तुझे फेसबुक से फुरसत मिले तब तो तू पड़ोसियों का खबर लेगा।"

"फिर तू फेसबुक पर बोलने लगा।"

"सुन। उनका एक लड़का है जो यूएई में इंजीनियर है। वह इनसे संपर्क नहीं रखता। काका रिटायर्ड कर्मचारी हैं। पेंशन के पैसे से अपना खर्च चलाते हैं। पत्नी को गुज़रे पाँच साल हो गए। और ज़्यादा जानकारी नहीं है। तुरंत पैसे का इंतेज़ाम नहीं हुआ तो उनकी मौत हो सकती है।"

"हाँ ये तो बहुत बुरा होगा।"

"कुछ नहीं होगा। तेरे पास यदि उनके किसी रिश्तेदार का कोई फोन नंबर हो तो उनसे संपर्क कर। घटना की जानकारी दे। और हाँ फिलहाल उन्हें खून की आवश्यकता है। उनका ब्लड ग्रुप ओ–नेगेटिव है और मुझे पता है की तेरा भी ग्रुप ओ–नेगेटिव ही है। इसलिए तू तुरंत हास्पिटल चल और एक बोतल खून दे।"

"माफ कर यार। अभी मेरी तबियत ठीक नहीं है। बहुत कमज़ोरी है। मैं खून नहीं दे सकता। हाँ एक काम कर सकता हूँ। फेसबुक पर एक अपील पोस्ट कर सकता हूँ। बहुत सारे लोग मदद को मिल जा सकते हैं। और फेस बुक पर उनके रिश्तेदारों को भी खोजने का प्रयास करता हूँ।"

"तू फेसबुक पर मुँह मार। मैं चला हास्पिटल," कहकर मैं उसके कमरे से बiहर निकल कर हॉस्पिटल की ओर चल पड़ा।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें