| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 03.02.2008 |
|
ये किसका खून बह रहा है, दोस्तो! |
|
ये किसका खून बह रहा है, दोस्तो! छोड़ आए जो वहशियत जंगल में जो बधावे जन्म पर होते थे दुस्साहस कहाँ से आ रहा है ढेर सारा जल रही है आग बुझ भी जाएगी मोहन के सब पाठ भुला कर आज |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|