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03.02.2008
 

सूरज और मैं
डॉ. राजेश कुमार


तीन दिन के बाद
आज सूरज दिखा है
मन बहुत उल्लसित है
ऐसा लगता है जैसे
तुम पहली फुरसत होते ही
मिलने के लिए चली आई हो।

यहाँ बहुत बादल थे
अँधेरा था उदासी थी
इच्छाओं पर जम गई थी बरफ़
चेहरे पर हवा के थपेड़े थे
पर अब सूरज की गरमी
हर चीज को आकार दे रही है
ताज़गी और चमक दे रही है।

बरफ़ पिघल रही है और
साँसों में गरमी है
सूर्य की किरणें मेरे चेहरे
को दुलार रही हैं
मैं उसकी तरफ नहीं देख पाता
पर वही अपनी ऊष्मा लिए मेरी
तरफ चलता ही आ रहा है।

अब मैं सूरज को सामने बिठाकर
चाय पियूँगा और कुछ खाऊँगा
और हाँ इससे आँख भी मिलाऊँगा
उलाहने दूँगा और फिर गुदगुदाऊँगा।

अब नहीं लगता कि ये सूरज जाएगा
लगता है साथ अब निभाएगा
मेरी खुशी में हँसेगा
गम में रोएगा
मुझे शक्ति देगा और
मेरे साथ पग बढ़ाएगा।

पर मैं जानता हूँ कि मुझे खुद ही
इसे विदा करना होगा
इसे अपनी जिम्मेदारी निभानी है
और विश्वास कायम रखना है
यह फिर बादलों और पहाड़ों के पीछे चला जाएगा
मन उदास होगा पर मुझे पता है कि
पहली फुरसत होते ही यह फिर आएगा।

[मास्को]


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