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03.02.2008
 

क्यों
डॉ. राजेश कुमार


क्यों बार-बार आते हो तीर पर
गरजते, चिल्लाते
सिर धुनते लपकाते
और छोड़ जाते हो अपनी नमी

जानते तो हो कि
रुक्ष कण हैं ये
नमी नहीं संभाल पाएँगे
(दिल कहाँ है इनका!)

ऊपर से सूरज की गरमी
धधका रही है इनको
ये डरते हैं उसके फैलाव से
इसलिए बेपरवाह हैं तुमसे।

सूरज को जरा जाने दो
साँझ अभी आएगी
प्रेम की मीठी तान
झिंगुर गुनगुनाएगी।

फिर तुम्हारी नमी में
नम होगा अग-जग
चंदा की चाँदनी तब
अमृतकण बरसाएगी।


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