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03.02.2008
 

आशंकित शहर
डॉ. राजेश कुमार


ये शहर चल रहा है
लेकिन आशंकित है
कब कौन पीछे से
आकर दबोच लेगा
पता नहीं
इसलिए जितना चलता है
उससे ज्यादा पीछे मुड़कर देखता है।

रास्ता लंबा है
पर गति नहीं है पैरों में
किसने डाल दी हैं बेड़ियाँ
अधोगति की?
कौन किससे हिसाब बराबर कर रहा है?
और प्राण सोख रहा है शहर के।

शहर में भूख है प्यास है गरीबी है
डर की हवा बहती है हर दम
सूख गया है विश्वास
और उठ चुका भरोसा है
किसने इसे बिठा दिया है
बारूद के ढेर पर
और हाथ में माचिस बजाता है?

कितना सुंदर है कितना भोला है
छलका है प्रेम जब-जब इसे टटोला है
चमकता है सूरज और
झील में खिलते हैं कमल
पहाड़ों से टकराकर लौटते हैं गीत
मन को देते हैं ­डक और राहत।

छलनी हो गए हैं कपड़े
और सीने में दर्द है
मायूसी छाई है चेहरे पर
और आँखें नम हैं
अपने बच्चों की बदहाली से दुखी है ये
अपने बच्चों की मूर्खता सताती है।

इंफाल


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