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ISSN 2292-9754

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10.26.2014


विरह की तड़प

गरज रहे बादल आषाढ़ के,
दौड़ रहे चित्र काढ़-काढ़ के।

मितवा का संदेशा मिल गया,
पथ देखूँ आँख फाड़-फाड़ के।

छांह-छांह आ जाओ साजना,
धूप गई पार उस पहाड़ के।

मीत की चाह को सजाऊँगी,
दूर हुए दिन अब उजाड़ के।

सौत हुई सजना की नौकरी,
बुलवाया खुशियों को ताड़ के।

आँखों में सूनापन अंज गया,
मीत गया मनुआ उखाड़ के।


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