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ISSN 2292-9754

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10.26.2014


प्रेमियों की गुफ़्तगू

चलो मीत गाँव चलें,
फिर से उस ठाँव चलें।

प्रीत पगी जहं अपनी,
उस अमुआ छाँव चलें।

अपनों ने दाँव चले,
अब हम इक दाँव चलें।

छोड़ कर विरासत को,
अब अपने पाँव चलें।

पार अब नदी के हम,
खेकर निज नाँव चलें।


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