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ISSN 2292-9754

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10.26.2014


खुलेआम अब जिस्मों का व्यापार चले

महानगर में खुलेआम अब जिस्मों का व्यापार चले,
यहाँ जरायमपेशाओं का अपना ही संसार चले।

जिस्मों का बाज़ार सजा है शोहदों की है भीड़ लगी,
सजी अप्सरा-सी गणिकायें पल-पल में अभिसार चले।

पकड़े जाने पर हर बंदा ‘झूठा फँसा दिया’ कहता,
छूटके आता रोब दिखाता इठलाकर मक्कार चले।

कुछ आकर्षण में डूबे जन कुछ मजबूरी के मारे,
बस्ती में भी चंद घरों में छुप-छुपकर व्यभिचार चले।

पोरनोग्राफी ने दुनिया को असमंजस में डाल दिया,
इस संजाली दुनिया पर ना कोई भी हथियार चले।


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