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| 05.13.2007 |
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उजाला छिन न पाएगा
डॉ० राजेन्द्र गौतम |
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यह धुआँ
सच ही बहुत कडुआ -
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा।
लाश की सूरज दबी
चट्टान के नीचे
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है
सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को
आत्ममुग्धा- गर्विता यह
व्यंग्य कसती है
एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा।
संखिया कोई--
कुओं में डाल जाता है
हवा व्याकुल
गव भर की देह है नीली
दिशाएँ निःस्पंद सब
बेहोश सीवाने
कुटिलता की गुंजलक
होती नहीं ढीली
पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा। |
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