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07.16.2007
 
पिता सरीखे गाँव
डॉ० राजेन्द्र गौतम

तुम भी कितने बदल गए
ओ पिता सरीखे गाँव।

परम्पराओं -सा बरगद का
कटा हुआ यह तन
बो देता है रोम-रोम में
बेचैनी सिहरन

तभी तुम्हारी ओर उठे ये
ठिठके रहते पाँव।

जिसकी वत्सलता में डूबे
कभी-कभी संत्रास
पच्छिम वाले उस पोखर में
सड़ती है अब लाश

किसमें छोड़ूँ सपनों वाली
कागज की यह नाव।

इस नक्शे से मिटा दिया है
किसने मेरा घर
बेखटके क्यों घूम रहा है
एक बनैला डर

मंदिर वाली इमली की भी
घायल है अब छाँव।

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