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05.28.2007
 
पंख ही चुनते रहे
डॉ० राजेन्द्र गौतम

विभ्रांतियाँ संगीत की
जब रात भर छलती रहीं
हम मौन के टूटे हुए लघु पंख ही चुनते रहे।

रीती हुई अनिवेदिता
फूलों भरी वह आँजुरी
कुचली गई पैरों तले
वह ओस भीगी पाँखुरी

दिखला गई सपने नये
फिर कामनाएँ रेशमी
पर रक्त-रंजित हाथ ले हम काँच ही चुनते रहे।

सूखी नदी का बालुका
संकेत-लिपि बन गीत की
रह मूक कहती जो कथा
भूली हुई-सी प्रीत की

करती विडम्बित अर्थ को
पर भंगिमाएँ वैखरी
हम शब्द लेकर खोखले बस तूल-सा धुनते रहे।

आबाद सपनों के शहर
तूफान में ऐसे घिरे
जितने महल हमने रचे
वे सब जमीं पर आ गिरे

हो दिग्भ्रमित यह जिन्दगी
जिस खण्डहर में आ गयी
टकरा उसी से लौटती आवाज हम सुनते रहे।

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