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05.28.2007
 
पाँवों में पहिए लगे
डॉ० राजेन्द्र गौतम

भूल गया
       मेरा शहर
              सब ऋतुओं के नाम।

गुलदस्ते
मधुमास को
बेचें बीच बजार
सिक्कों की खनकार में
सिसके मेघ मल्हार
गोदामों में
               ठिठुरती
               जब से वत्सल घाम।

पाँवों में
पहिए लगे
करें हवा से बात
पर खुद तक पहुँचे कहाँ
चल कर हम दिन-रात
यहाँ-वहाँ
               भटका रहीं रोशनियाँ अविराम।

पूरब सुकुआ
कब उगा
कब भीगी थी दूब
हिरनी छाई गगन कब
चाँद गया कब डूब
सभी कथानक
गुम हुए
               भौंचक दक्षिण-वाम।

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