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06.30.2007
 
मुझको भुला देना
डॉ० राजेन्द्र गौतम

तुम एक बिसरे गीत-सा मुझको भुला देना।

जब नीम का वह ठूँठ डूबेगा अँधेरे में
जब दूर पर लौ झोंपड़ी में टिमटिमाएगी
होगी समेटे गोद में कुछ राग अनजाने
वह एक खामोषी तुम्हारे पास आएगी

यदि यों अकेले में कभी शिशु याद के जागें
दे थपकियाँ चुपचाप तुम उनको सुला देना।

कब की मिटी उस राह पर पदरेख भी अब तो
जिस पर कुँवारी मंजरी की गंध बिखरी थी
वे दहकते अंगार भी अब बुझ चुके सारे
पा आँच जिनसे स्वप्न की भी देह निखरी थी

उनकी क्षितिज के छोर तक अब धूल उड़ती है
छूटी कहीं कुछ शेष तो जल में बहा देना ।

है एक कुहरा अब नदी के पाट पर छाया
इन दो तटों के बीच में चट्टान फैली है
मैं जानता हूँ डबडबाए नयन है किसके
तुम जानती इस ओर भी दो आँख मैली हैं

होगा नहीं इन दूरियों का संतरण अब तो
पुल बह गए जो धार में उनको भुला देना।

सब जा रहे मिटते समय की रेत पर आखर
धुँधले हुए सन्दर्भ का इतिहास क्या लिखना
रूमाल-सा टुकड़ा बचा उस विगत गाथा का
देगा नहीं संतोष कुछ भी पास में रखना

तूफान सुनते हैं कहीं पर पास ही सोया
खतरा बनें जो पेड़ को वे पल भुला देना।

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