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| 06.30.2007 |
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मुझको भुला देना डॉ० राजेन्द्र गौतम |
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तुम एक बिसरे गीत-सा मुझको भुला देना।
जब नीम का वह ठूँठ डूबेगा अँधेरे में
यदि यों अकेले में कभी शिशु याद के जागें
कब की मिटी उस राह पर पदरेख भी अब तो
उनकी क्षितिज के छोर तक अब धूल उड़ती है
है एक कुहरा अब नदी के पाट पर छाया
होगा नहीं इन दूरियों का संतरण अब तो
सब जा रहे मिटते समय की रेत पर आखर
तूफान सुनते हैं कहीं पर पास ही सोया |
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