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| 05.28.2007 |
| महानगर में संध्या डॉ० राजेन्द्र गौतम |
| महानगर के बाजारों में गिरह काटती धूसर संध्या। स्वेद-सिक्त धकियाते चेहरे रुद्ध राह है, पग पथराये रक्त-जात सम्बन्धों को भी रहे बाँट गूँगे चौराहे यहाँ रोज ईमान खरीदे बेच शील पेशेवर संध्या । दिशा-हीन अंधी भीड़ों में रहा खोज क्या निपट अकेला लुटा राह में बनजारों-सा गया छूट पीछे वह मेला सूख गीत के अंकुर जाते भूमि नागरी ऊसर वंध्या। बनी बेड़ियाँ हैं अनदेखी वर्ण-गंध की मधु छलनाएँ लिये वंचना का बोझा हम कहाँ-कहाँ की ठोकर खाएँ विहग फाँस कर विश्वासों के पंख कतरती निष्ठुर संध्या। |
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