| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 06.30.2007 |
| हम दीप जलाते हैं डॉ० राजेन्द्र गौतम |
|
यह रोडे-कंकड़-सा जो कुछ अटपटा सुनाते हैं फिर सुविधाओं के रथ पर चढ़कर हम टायर के जूतों-से छीजे संवेदन पहने हैं हम हैं
कविता के राजपथिक कब? लेकिन जितना भी डामर है इस पथ पर बिछा हुआ हम जिन हाथों को किए हुए हैं तुम तो बैठे हो मुक्त गद्य की मीनारों पर जाकर |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|