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01.31.2008
 

द्वापर-प्रसंग
डॉ० राजेन्द्र गौतम


बहता काला रक्त है
          हरिण-मुखी थिर पाँव
यह द्वापर की साँझ है
          ढलती जाती छाँव।

लपटें उठतीं गगन तक
          कैसा यह मृग-दाव
इस अंधे युग के नहीं
          संभव मिटने घाव।

दुर्लभ अपनी बंधुता
          दुर्लभ यह प्रासाद
कक्ष-कक्ष में लाख से
          हों संबंध अगाध।

प्रजातंत्र की द्रौपदी
         राजनीति का द्यूत
पौरुष के अपमान की
          गाथा कहते सूत।

चंपानगरी-सा छुटा
         शिशु-वसु कब किस तीर
मान-दग्ध कुरु-भूमि में
         हम वैकर्तन वीर।

अभिनंदित क्यों हो नहीं
          भीष्म-जयी गांडीव
रक्षित नंदी-घोष में
          ढाल बना जब क्लीव।

रह कोलाहल-धर्षिता
          सांध्य-काकली मौन
हुई विवसना श्यामला
          अब वंशीधर कौन।

कौरवता इस दौर में
          इतनी हुई असीम
दुःशासन के सामने
          बौने अर्जुन-भीम।

नायक-खलनायक हुए
           अब इतने समरूप
लगे वक्त का चेहरा
           धरे विदूषक रूप।

रहने दो अब मत कहो
           दया करो हे व्यास
पिघले शीशे-सा हुआ
          रक्त-सना इतिहास।


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